Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 1

28 Mantra
38/1
Devata- सविता देवता Rishi- आथर्वण ऋषिः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्।आ द॒देऽदि॑त्यै॒ रास्ना॑ऽसि॥१॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम् ॥ आ। द॒दे॒। अदि॑त्यै। रास्ना॑। अ॒सि॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे श्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आ ददेदित्यै रास्नासि ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्॥ आ। ददे। अदित्यै। रास्ना। असि॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र से ही सैंतीसवें अध्याय का प्रारम्भ हुआ था । अन्त के ('अदित्यै रासनासि') = के स्थान पर वहाँ 'नारिरसि' ये शब्द थे । 'संसार की प्रत्येक वस्तु हमारी शत्रु नहीं है' के स्थान में यहाँ शब्द ये हैं कि (अदित्यै) = अखण्डन व पूर्ण स्वास्थ्य के लिए तू (रास्ना) = कमरबन्ध है, अर्थात् तू हमारे पूर्ण स्वास्थ्य की साधिका है, परन्तु कब ? जब १. (त्वा) = तुझे (सवितुः देवस्य) = उस सविता-सबके प्रेरक, देव-दिव्य गुणों के पुञ्ज व सम्पूर्ण ज्ञान का प्रकाश देनेवाले प्रभुके प्रसवे प्रेरणा व आज्ञा में आददे ग्रहण करता हूँ। प्रभु का आदेश संक्षेप में यह है कि ('त्यक्तेन भुञ्जीथा:') = त्यागपूर्वक उपभोग करो, अतः हम प्रत्येक वस्तु का सेवन करते हुए उसमें उलझें नहीं। हम वस्तु का ग्रहण करें-वस्तु हमारा ग्रहण न कर ले। स्वाद में पड़े और वस्तु के शिकंजे में फँसे । २. जब तुझे (अश्विनो:) = प्राणापान के (बाहुभ्याम्) = प्रयत्न से ग्रहण करता हूँ, अर्थात् अपने पुरुषार्थ से कमाई वस्तु का ही हम ग्रहण करते हैं, बिना श्रम के हम कुछ भी नहीं लेते। ३. तुझे (पूष्णः) = पूषा के (हस्ताभ्याम्) = हाथों से ग्रहण करता हूँ। जब पोषण के दृष्टिकोण से हम प्रत्येक वस्तु को स्वीकार करते हैं तब वह हमारे स्वास्थ्य को सिद्ध करनेवाली बनती है। वेद के शब्दों में वह 'अदिति' की 'रास्ना' हो जाती है। 'अदितिः अदीना देवमाता' निरुक्त के शब्दों के अनुसार [क] प्रभु की आज्ञा में त्यागपूर्वक वस्तुओं के ग्रहण से [ख] प्राणापान के प्रयत्न से - पुरुषार्थपूर्वक अर्जन करने से और [ग] पोषण के दृष्टिकोण से वस्तुओं के लेने पर हम अदीन बनेंगे और अपने जीवन में दिव्य गुणों का निर्माण कर सकेंगे।
Essence
भावार्थ- हमारे जीवन के तीन सूत्र हों - हम १. प्रभु की आज्ञा में २. प्रयत्न से ३. पोषण के ही लिए वस्तुओं का ग्रहण करें।