Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 8

21 Mantra
37/8
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- स्वराडतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म॒खस्य॒ शिरो॑ऽसि। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे।म॒खस्य॒ शिरो॑ऽसि। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे।म॒खस्य॒ शिरो॑ऽसि। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥८॥

म॒खस्य॑। शिरः॑। अ॒सि॒। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खस्य॑। शिरः॑। अ॒सि॒। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खस्य॑। शिरः॑। अ॒सि॒। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। ॥८ ॥

Mantra without Swara
मखस्य शिरो सि । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे । मखस्य शिरो सि । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे । मखस्य शिरो सि । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

मखस्य। शिरः। असि। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखस्य। शिरः। असि। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखस्य। शिरः। असि। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे।॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'दध्यङ्' आत्मप्रेरणा देते हुए कहते हैं कि (मखस्य शिरः असि) = तू यज्ञ का शिखर है, अर्थात् तूने यज्ञ के पर्वत पर आरोहण किया है, तराई में बैठा नहीं रह गया। मेखला तक पहुँचकर तू शिखर तक पहुँचा है। तुझमें यज्ञ ने पूर्णरूप से मूर्तरूप धारण किया है। यह दध्यङ् किसी भी वस्तु का ग्रहण करते हुए कहता है कि मैं (त्वा) = तुझे (मखाय) = यज्ञ के लिए ग्रहण करता हूँ, (त्वा) = तुझे (मखस्य) यज्ञ के (शीर्ष्णे) = शिखर पर पहुँचने के लिए ग्रहण करता हूँ। 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों के दृष्टिकोण से उल्लिखित बात को कहने के लिए उल्लिखित वाक्य को यहाँ तीन बार कहा गया है और इस वाक्य को कहने के बाद यज्ञ के तीन अंशों 'देवपूजा, सङ्गतिकरण व दान' के दृष्टिकोण से कहते हैं कि (त्वा) = तुझे (मखाय) = यज्ञ के लिए, (त्वा) = तुझे मखस्य शीर्ष्णे यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए ग्रहण करता हूँ।
Essence
भावार्थ - [क] हमें शरीर के दृष्टिकोण से यज्ञ के शिखर पर पहुँचना है, अर्थात् अपनी शारीरिक शक्ति को निर्बलों की रक्षा के लिए विनियुक्त करना है। [ख] मन के दृष्टिकोण से भी यज्ञ के शिखर पर पहुँचना है, अर्थात् मन में कभी भी किसी का द्रोह-चिन्तन न करके सबके लिए मङ्गल की कामना करनी है। [ग] हमें बुद्धि के दृष्टिकोण से भी यज्ञ के शिखर पर जाना है, अर्थात् हमारी बुद्धि सदा सबके भले की योजनाओं के बनाने में विनियुक्त हो ।
Subject
यज्ञ का शिखर