Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 7

21 Mantra
37/7
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्रैतु॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॒ प्र दे॒व्येतु सू॒नृता॑। अच्छा॑ वी॒रं नर्यं॑ प॒ङ्क्तिरा॑धसं दे॒वा य॒ज्ञं न॑यन्तु नः। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥७॥

प्र। ए॒तु॒। ब्रह्म॑णः। पतिः॑। प्र। दे॒वी। ए॒तु॒। सू॒नृता॑। अच्छ॑। वी॒रम्। नर्य्य॑म्। प॒ङ्क्तिरा॑धस॒मिति॑ प॒ङ्क्तिऽरा॑धसम्। दे॒वाः। य॒ज्ञम्। न॒य॒न्तु॒। नः॒ ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒ शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒ शी॒र्ष्णे ॥७ ॥

Mantra without Swara
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरन्नर्यम्पङ्क्तिराधसन्देवा यज्ञन्नयन्तु नः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

प्र। एतु। ब्रह्मणः। पतिः। प्र। देवी। एतु। सूनृता। अच्छ। वीरम्। नर्य्यम्। पङ्क्तिराधसमिति पङ्क्तिऽराधसम्। देवाः। यज्ञम्। नयन्तु। नः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा शीर्ष्णे॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कण्व' मेधावी है। इसकी प्रार्थना है कि १. (ब्रह्मण: पति:) = ज्ञान का स्वामी प्रभु हमें (प्रएतु) = प्रकर्षेण प्राप्त हो। इस ज्ञान के स्वामी की प्राप्ति से हमारा ज्ञानभण्डार समृद्ध हो। २. (देवी) = दिव्यगुणोंवाली (सूनृता) = [सु+ऊन + ऋत] उत्तम, दुःखों का परिहाण करनेवाली ठीक वाणी प्रएतु प्रकर्षेण प्राप्त हो, अर्थात् हम प्रिय सत्यवाणी को बोलनेवाले हों। ३. (देवाः) = सब देव (नः) = हमें (वीरम्) = वीर बनानेवाले (नर्यम्) = नरहित के कार्यों में प्रेरित करनेवाले (पङ्क्तिराधसम्) = कर्मेन्द्रियपञ्चक, ज्ञानेन्द्रियपञ्चक प्राणपञ्चक व अन्तःकरणपञ्चक [हृदय, मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार] की उत्तमता को सिद्ध करनेवाले (यज्ञम् अच्छ) = यज्ञ की ओर (नयन्तु) = ले - चलें। संक्षेप में, हमारे मस्तिष्क ज्ञान से परिपूर्ण हों, हमारी जिह्वा सूनृत वाणी का उच्चारण करनेवाली हो और हमारे हाथ यज्ञों में व्यापृत रहें । मैं (त्वा) = ज्ञान को, सूनृत वाणी को व उत्तम कर्मों को (मखाय) = सब दोषों का निवारण करनेवाले यज्ञ के लिए ग्रहण करता हूँ । (त्वा) = इन ज्ञान आदि को इसलिए अपनाता हूँ कि (मखस्य शीर्ष्णे) = यज्ञ के शिखर पर पहुँच सकूँ। यज्ञ के लिए, यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए। यज्ञ के लिए और यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए ही।
Essence
भावार्थ- मेरा ज्ञान, मेरी सूनृतवाणी, मेरे उत्तम कर्म- ये सभी मुझे यज्ञमय बनाएँ।
Subject
ज्ञान, सूनृतवाणी व यज्ञ