Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 6

21 Mantra
37/6
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्द्र॒स्यौज॑ स्थ म॒खस्य॑ वो॒ऽद्य शिरो॑ राध्यासं देव॒यज॑ने पृथि॒व्याः।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥६॥

इन्द्र॑स्य। ओजः॑। स्थ॒। म॒खस्य॑। वः॒। अ॒द्य। शिरः॑। रा॒ध्या॒स॒म्। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे ॥६ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्यौज स्थ मखस्य वोद्य शिरो राध्यासन्देवयजने पृथिव्याः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

इन्द्रस्य। ओजः। स्थ। मखस्य। वः। अद्य। शिरः। राध्यासम्। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे॥६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (ओजः) = ओज [शक्ति] (स्थ) = हो । (वः) = तुम्हारे द्वारा (अद्य) = आज (मखस्य) = यज्ञ के (शिरः) = शिखर को (राध्यासम्) = सिद्ध करूँ। (पृथिव्याः) = इस पृथिवी के (देवयजने) = देवों के यज्ञ करने के स्थान में (त्वा) = तुझे (मखाय) = यज्ञ के लिए ग्रहण करता हूँ, (मखस्य शीर्ष्णे) = यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए (त्वा) = तुझे ग्रहण करता हूँ । सचमुच, यज्ञ के लिए और यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए ही मन्त्र में तीन बार इस बात को दोहराया गया है कि 'यज्ञ के लिए और यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए मैं ओज का ग्रहण करता हूँ। 'ओज' नाम है शक्ति का । यह शक्ति इन्द्र की है, अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष को ही प्राप्त होती है। अजितेन्द्रियता शक्ति को क्षीण करनेवाली है। मैं जितेन्द्रिय बनकर शक्ति प्राप्त करूँ और उस शक्ति का यज्ञों की सिद्धि के लिए विनियोग करूँ। जीवात्मा की चौबीस शक्तियाँ हैं। ये चौबीस-की- चौबीस मुझे यज्ञ के शिखर पर पहुँचानेवाली हों । यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इन्द्र की चौबीस शक्तियाँ हैं और चौबीस बार ही 'मखाय त्वा मखास्य त्वा शीर्ष्णे' यह वाक्य आवृत्त हुआ है, 'यज्ञ के लिए और यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए' यह बात चौबीस बार दुहराई गई है, एवं इन्द्र ने अपनी एक-एक शक्ति को यज्ञ की सिद्धि के लिए ही विनियुक्त करना है।
Essence
भावार्थ- जितेन्द्रिय पुरुष की शक्तियाँ यज्ञ की सिद्धि के लिए विनियुक्त होती हैं।
Subject
इन्द्र के ओज