Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 5

21 Mantra
37/5
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- विराड् ब्राह्मी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इय॒त्यग्र॑ऽआसीन्म॒खस्य॑ ते॒ऽद्य शिरो॑ राध्यासं देव॒यज॑ने पृथि॒व्याः।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शीर्ष्णे॥५॥

इय॑ति। अग्रे॑। आ॒सी॒त्। म॒खस्य॑। ते॒। अ॒द्य। शिरः॑। रा॒ध्या॒स॒म्। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे ॥५ ॥

Mantra without Swara
इयत्यग्रेऽआसीन्मखस्य तेद्य शिरो राध्यासन्देवयजने पृथिव्याः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

इयति। अग्रे। आसीत्। मखस्य। ते। अद्य। शिरः। राध्यासम्। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(इयति) = इतनी ही (अग्रे) = सबसे प्रथम स्थान में (आसीत्) = मनुष्य की साधना थी । यह यज्ञ ही मनुष्य का मौलिक कर्त्तव्य था । यज्ञान्तर्गत 'देवपूजा, सङ्गतिकरण व दान' ही मुख्य धर्म थे, इसलिए 'दध्यङ्' कहता है कि (अद्य) = आज (ते मखस्य) = तुझ यज्ञ के (शिर:) = शिखर को (राध्यासम्) = सिद्ध करूँ। (पृथिव्याः) = पृथिवी के देवयजने देवताओं के यज्ञ करने के स्थान में मैं (त्वा) = तुझे मखाय यज्ञ के लिए ही ग्रहण करता हूँ, (त्वा) = तुझे (मखस्य शीर्ष्णे) यज्ञ के शिखर पर पहुँचने के लिए ग्रहण करता हूँ। मनुष्य का प्रथम कर्त्तव्य यह यज्ञ ही है। यज्ञ एक पर्वत है जिसका मूल 'देवजपूजा' है, इस पर्वत का मध्य 'सङ्गतिकरण' है और इसका शिखर 'दान' है। हमें इस मानवजीवन को प्राप्त करके देवपूजा से जीवन प्रारम्भ करना है। हम माता, पिता, आचार्य व अतिथियों को देव समझें और उनकी आज्ञा में चलते हुए उनका आदर करनेवाले बनें। हमारा व्यावहारिक जीवन 'सङ्गतिकरण 'वाला हो। हम सबके साथ मिलकर चलना सीखें। हमारा परस्पर विरोध न हो। हम अपने न्ययार्जित धन में से कुछ-न-कुछ देनेवाले बनें। इसी को यज्ञशेष व अमृत का सेवन कहते हैं। इस दान की प्रवृत्ति को अपनाकर मैं यज्ञपर्वत के शिखर पर पहुँच जाता हूँ।
Essence
भावार्थ- मेरा जीवन सदा इस बात का ध्यान करके चले कि 'देवपूजा, सङ्गतिकरण व दान' ही मेरे सबसे प्रथम व मुख्य कर्त्तव्य हैं। ये ही कर्त्तव्यों के अग्रभाग में स्थित हैं।
Subject
सर्वप्रथम कर्त्तव्य