Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 4

21 Mantra
37/4
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
देव्यो॑ वम्र्यो भू॒तस्य॑ प्रथम॒जा म॒खस्य॑ वो॒ऽद्य शिरो॑ राध्यासं देव॒यज॑ने पृथि॒व्याः।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥४॥

देव्यः॑। व॒म्र्यः। भू॒तस्य॑। प्र॒थ॒म॒जा इति॑ प्रथम॒ऽजाः। म॒खस्य॑। वः॒। अ॒द्य। शिरः॑। रा॒ध्या॒स॒म्। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे ॥४ ॥

Mantra without Swara
देव्यो वर्म्या भूतस्य प्रथमजा मखस्य वोद्य शिरो राध्यासन्देवयजने पृथिव्याः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

देव्यः। वम्र्यः। भूतस्य। प्रथमजा इति प्रथमऽजाः। मखस्य। वः। अद्य। शिरः। राध्यासम्। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'वम्री' शब्द वम् धातु से बना है, जिसका अर्थ है उद्गिरण - बाहर फेंकना। शरीर में वह शक्ति जो मल को शरीर से बाहर फेंकती है, 'वम्री' कहलाती है । यही अपानशक्ति है। वह अपानशक्ति ठीक काम करती रहती है तो पसीने के द्वारा व मल-मूत्र के शोधन के द्वारा यह शरीर को पूर्ण स्वस्थ बनाये रखती है। इनके ठीक कार्य करने पर ही अन्य शक्तियों का विकास निर्भर है, अतः 'दध्यङ्' कहता है कि (देव्यः) = दिव्य गुणोंवाली (वग्र्यः) = उद्गिरणशक्तियो ! जो तुम भूतस्य प्राणिमात्र के (प्रथमजा) = सर्वाधिक विकास [जन्] का कारण हो, (वः) = तुम्हारे द्वारा मैं (अद्य) = आज (मखस्य शिरः) = यज्ञ के शिखर को (राध्यासम्) = सिद्ध करूँ। (पृथिव्याः) = इस पृथिवी के (देवयजने) = देवताओं के यज्ञ करने के स्थान पर (त्वा) = तुझे मखाय = यज्ञ के लिए ग्रहण करता हूँ, (त्वा) = तुझे (मखस्य) = यज्ञ के (शीर्ष्णे) = शिखर पर पहुँचने के लिए ग्रहण करता हूँ। हम अपानशक्ति को ठीक रखें तभी तो पिछले मन्त्रों में वर्णित दीप्तमस्तिष्क व स्वस्थ शरीर को पा सकेंगे। ये अपान-शक्तियाँ दिव्य हैं, बड़ी सुन्दर हैं, ये हमारे जीवन को स्वस्थ बनाती हैं, हमारी सब शक्तियों के विकास का कारण बनती हैं। इनके द्वारा मैं अपने जीवन में यज्ञ को सिद्ध करनेवाला बनूँ, यज्ञ के शिखर पर पहुँच जाऊँ ।
Essence
भावार्थ- मेरी अपानशक्तियाँ मुझे स्वस्थ बनाकर यज्ञ में समर्थ करें।
Subject
दिव्य इन्द्रियाँ - उत्तम अपानशक्तियाँ