Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 20

21 Mantra
37/20
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- आथर्वण ऋषिः Chhand- निचृदतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पि॒ता नो॑ऽसि पि॒ता नो॑ बोधि॒ नम॑स्तेऽअस्तु॒ मा मा॑ हिꣳसीः। त्वष्टृ॑मन्तस्त्वा सपेम पु॒त्रान् प॒शून् मयि॑ धेहि प्र॒जाम॒स्मासु॑ धे॒ह्यरि॑ष्टा॒हꣳ स॒ह प॑त्या भूयासम्॥२०॥

पि॒ता। नः॒। अ॒सि॒। पि॒ता। नः॒। बो॒धि॒। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। मा। मा॒। हिं॒सीः॒ ॥ त्वष्टृ॑मन्त॒ इति॒ त्वष्टृ॑ऽमन्तः। त्वा॒। स॒पे॒म॒। पु॒त्रान्। प॒शून्। मयि॑। धे॒हि॒। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। अ॒स्मासु॑। धे॒हि॒। अरि॑ष्टा। अ॒हम्। स॒हप॒त्येति॑ स॒हऽप॑त्या। भू॒या॒स॒म् ॥२० ॥

Mantra without Swara
पिता नोसि पिता नो बोधि नमस्तेऽअस्तु मा मा हिँसीः । त्वष्टृमन्तस्त्वा सपेम पुत्रान्पशून्मयि धेहि प्रजामस्मासु धेह्यरिष्टाहँ सहपत्या भूयासम् ॥

पिता। नः। असि। पिता। नः। बोधि। नमः। ते। अस्तु। मा। मा। हिंसीः॥ त्वष्टृमन्त इति त्वष्टृऽमन्तः। त्वा। सपेम। पुत्रान्। पशून्। मयि। धेहि। प्रजामिति प्रऽजाम्। अस्मासु। धेहि। अरिष्टा। अहम्। सहपत्येति सहऽपत्या। भूयासम्॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गृहपत्नी विशेषरूप से प्रभु-प्रार्थना करती है कि [१] हे प्रभो! (पिता नः असि) = आप ही हमारे पिता - रक्षक हैं। [२] (पिता नः बोधि) = हमारे पिता आप हमें ज्ञान दीजिए। पिता का पहला काम पुत्र को योग्य बनाना है। [३] (नमः ते) = हम आपके प्रति नतमस्तक होते हैं। पुत्र का कर्त्तव्य है कि वह धृष्ट न हों। [४] (मा मा हिंसी:) = आप हमें हिंसित मत कीजिए। ज्ञान के अभाव में ही हमारी हिंसा होती है। खान-पान में अज्ञानवश गलतियों से स्वास्थ्य बिगड़ता है तो अज्ञानवश परस्पर द्वेष से लड़ाई-झगड़े बढ़कर हिंसा होती है । [५] (त्वष्टृमन्तः) = वेदवाणीवाले [वाग्वै त्वष्टा । ऐ० २।४], ज्ञान की वाणियों को प्राप्त होनेवाले हम (त्वा) = आपकी (सपेम) = पूजा करें [To honour, to worship ], आपकी आज्ञा का पालन करें [to obey] और आपको प्राप्त करें [to obtain ] [६] (मयि) = आपके वेद के आदेश के अनुसार चलनेवाली मुझमें पुत्रान् पशून् पुत्रों को व पशुओं को (धेहि) = स्थापित कीजिए । आपकी कृपा से हमें उत्तम सन्तान प्राप्त हों और उनके पालन के लिए हमें उत्तम पशु भी प्राप्त हों। गौवों के दूध से उनके मस्तिष्क का सुन्दर पोषण हो और घोड़ों से व्यायाम के द्वारा उनके शरीर सबल हों। [७] अस्मासु हमारे जीवनों में भी (प्रजाम्) = प्रकृष्ट विकास को (धेहि) = धारण कीजिए। हमारी शक्तियों का उत्तम विकास हो और [८] अन्त में (अहम् पत्या सह) = अपने पति के साथ (अरिष्टा) = अहिंसित (भूयासम्) = होऊँ। मेरा शरीर रोगों से हिंसित न हो और मन द्वेष से आविष्ट न हो। हम पति पत्नी परस्पर हाथ पकड़कर सुविधा से इस भवसागर को पार कर जाएँ।
Essence
भावार्थ - प्रभु को पिता जानते हुए हम उससे ज्ञान प्राप्त करें। ज्ञानवाले होकर प्रभु के उपासक बनें। इहिलौकिक साफल्य के साथ हम इस भवसागर को तैरने का भी ध्यान करें।