Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 19

21 Mantra
37/19
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- आथर्वण ऋषिः Chhand- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
हृ॒दे त्वा॒ मन॑से त्वा दि॒वे त्वा॒ सूर्य्या॑य त्वा।ऊ॒र्ध्वोऽअ॑ध्व॒रं दि॒वि दे॒वेषु॑ धेहि॥१९॥

हृ॒दे। त्वा॒। मन॑से। त्वा॒। दि॒वे। त्वा॒। सूर्य्या॑य। त्वा॒। ऊ॒र्ध्वः। अ॒ध्व॒रम्। दि॒वि। दे॒वेषु॑। धे॒हि॒ ॥१९ ॥

Mantra without Swara
हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा । ऊर्ध्वा अध्वरन्दिवि देवेषु धेहि ॥

हृदे। त्वा। मनसे। त्वा। दिवे। त्वा। सूर्य्याय। त्वा। ऊर्ध्वः। अध्वरम्। दिवि। देवेषु। धेहि॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(‘दध्यङ्’) = ‘ध्यान के मार्ग पर चलनेवाला' प्रभु से कहता है कि [१] (हृदे त्वा) = मैं अपने हृदय के लिए आपका स्मरण करता हूँ। प्रभु स्मरण से हृदय प्रसादमय व सब दुःखों से दूर रहता है। [२] (मनसे त्वा) = मैं अपने मन के शोधन के लिए आपका ग्रहण करता हूँ। प्रभु - चिन्तन से मन एकाग्र होता है और विकल्पों से ऊपर उठकर शिवसंकल्पवाला हो जाता है। [३] (दिवे त्वा) = प्रकाश के लिए मैं आपका स्मरण करता हूँ। प्रभुस्मरण से जीवन में कभी अन्धकार नहीं आता, मार्ग स्पष्ट दिखता है। वस्तुतः हृदयस्थ प्रभु ही उस समय हमारा सञ्चालन करते हैं। वहाँ गलती का प्रश्न ही नहीं रहता [४] (सूर्याय त्वा) = प्रभो ! मैं सूर्य की भाँति निरन्तर नियमित गति के लिए आपका स्मरण करता हूँ। प्रभु के बनाये संसार में कोई वस्तु स्थिर नहीं, सभी क्रियाशील हैं, संसार का अर्थ ही 'संसरणशील' है, 'जगत्' का अर्थ है - ' गतिशील। जीव का भी नाम आत्मा है - ' सतत गतिशील' [अत सातत्यगमने] [५] हे प्रभो! आप (ऊर्ध्वः) = सर्वोच्च स्थान में स्थित हैं। परमेष्ठी हैं। इस परम स्थान में स्थित हुए - हए आप (दिवि) = ज्ञान का प्रकाश होने पर (देवेषु) = दिव्य गुणोंवाले हम लोगों में (अध्वरम्) = यज्ञ को (धेहि) = धारण कीजिए। हम किसी प्रकार की हिंसा न करें। वस्तुतः नैतिक मार्ग में सर्वोच्च स्थान अहिंसा का ही है। मैं सभी के साथ प्रेम से चलूँ, किसी की हिंसा न करूँ। जो व्यक्ति द्वेष से ऊपर उठ पाता है, वही प्रभु को पाने का अधिकारी होता है।
Essence
भावार्थ- हमारा हृदय प्रभु का स्मरण करे, मन प्रभु का चिन्तन करे, हमारा मस्तिष्क प्रकाशमय हो, जीवन क्रियाशील हो, हम ज्ञानी बनकर यज्ञ को अपने जीवन का अङ्ग बनाएँ, संसार में किसी से द्वेष न करें।
Subject
अध्वर का धारण