Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 17

21 Mantra
37/17
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अप॑श्यं गो॒पामनि॑पद्यमान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम्।स स॒ध्रीचीः॒ स विषू॑ची॒र्वसा॑न॒ऽआ व॑रीवर्त्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः॥१७॥

अप॑श्यम्। गो॒पाम्। अनि॑पद्यमान॒मित्यनि॑ऽपद्यमानम्। आ। च॒। परा॑। च॒। प॒थिभि॒रिति॑ प॒थिऽभिः॑। चर॑न्तम् ॥ सः। स॒ध्रीचीः। सः। विषू॑चीः। वसा॑नः। आ। व॒री॒व॒र्त्ति॒। भुव॑नेषु। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥१७ ॥

Mantra without Swara
अपश्यङ्गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम् । स सध्रीचीः स विषूचीर्वसानऽआ वरीवर्त्ति भुवनेष्वन्तः ॥

अपश्यम्। गोपाम्। अनिपद्यमानमित्यनिऽपद्यमानम्। आ। च। परा। च। पथिभिरिति पथिऽभिः। चरन्तम्॥ सः। सध्रीचीः। सः। विषूचीः। वसानः। आ। वरीवर्त्ति। भुवनेषु। अन्तरित्यन्तः॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु का चिन्तन करता हुआ स्वाहा के साथ अग्नि [ अपनी पत्नी के साथ पति] कहता है कि [१] मैं (गोपाम्) = सब वेदवाणियों के रक्षक उस प्रभु को (अपश्यम्) = देखता हूँ। वे प्रभु 'गोपा' हैं-रक्षक हैं। वे गौओं के पालक हैं तो मैं उनकी गौ हूँ [२] (अनिपद्यमानम्) = वे प्रभु कभी नीचे लेट नहीं जाते। सदा सावधान हैं। वे अप्रमत्त होकर हमारी रक्षा कर रहे हैं। [३] (आ च) = चारों ओर तथा समीप वर्त्तमान (परा च) = और दूर-दूर भी वर्त्तमान (पथिभिश्चरन्तम्) = मार्गों से विचरण करते हुए उस प्रभु को मैं देखता हूँ। वे प्रभु सर्वत्र हैं। हम सबके हृदयों में भी विद्यमान हैं, वहाँ स्थित हुए हुए ही वे गोपा - सब वेदवाणियों के रक्षक है। हमें वेद का ज्ञान देते हैं, परन्तु इस वेदवाणी को सुन वे ही पाते हैं जिनका हृदय निर्मल होता है। ज्ञान की वाणियों से वे प्रभु हमारे जीवन को प्रकाशमय करके हमारी इन्द्रियों को निर्मल बनाते हैं- इन्हें आसुरी आक्रमणों से बचाते हैं, इसलिए भी वे प्रभु गो-पा-इन्द्रियों के रक्षक हैं। [४] (सः) = वे प्रभु (सध्रीची:) = [सह अञ्चन्ति ] मिलकर चलनेवाले लोकों के तथा (विषूची:) = [वि-सु-अञ्च] विविध मार्गों में उत्तमता से चलनेवाले लोकों को (वसानः) = अच्छादित कर रहे हैं, अर्थात् अपने गर्भ में धारण कर रहे हैं। जैसे सूर्य के चारों ओर कुछ पिण्ड घूम रहे हैं, सूर्य उन्हें अपने आकर्षण से खेंचे हुए आकाश में आगे-आगे चला रहा है। ये लोक 'सध्रीची' कहलाते हैं, परन्तु कुछ पिण्ड ऐसे भी हैं जो भिन्न-भिन्न दिशाओं में अलग-अलग गति कर रहे हैं, ये 'विषूची' हैं। प्रभु इन सबको धारण किये हुए हैं। यहाँ प्रसंगवश यह भी स्पष्ट हो गया कि 'लोक दो भागों में बटे हुए हैं- कुछ समुदाय में चलनेवाले व कुछ अलग-अलग चलनेवाले। [५] वे प्रभु इन सब (भुवनेषु अन्तः) = लोकलोकान्तरों के अन्दर (आवरीवर्त्ति) = चारों ओर अपनी सत्ता से वर्त्तमान है। देखनेवाले के लिए प्रत्येक पिण्ड में प्रभु की सत्ता के चिह्न विद्यमान हैं । प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'दीर्घतमा' है। इसने अपने तम-अज्ञानान्धकार का विद्रावण किया है [दृ विदारणे] अन्धकार के दूर होने पर ही यह उस प्रभु को देख पाया है [अपश्यम्] ।
Essence
भावार्थ- वे प्रभु ही रक्षक हैं, सब लोकों को अपने में धारण किये हुए हैं, सर्वत्र वर्त्तमान हैं।
Subject
जगदीश - दर्शन