Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 11

21 Mantra
37/11
Devata- सविता देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒माय॑ त्वा म॒खाय॑ त्वा॒ सूर्य्य॑स्य त्वा॒ तप॑से।दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता मध्वा॑नक्तु पृथि॒व्याः सꣳस्पृश॑स्पाहि।अ॒र्चिर॑सि शो॒चिर॑सि॒ तपो॑ऽसि॥११॥

य॒माय॑। त्वा॒। म॒खाय॑। त्वा॒। सूर्य्य॑स्य। त्वा॒। तप॑से। दे॒वः। त्वा॒। स॒वि॒ता। मध्वा॑। अ॒न॒क्तु॒। पृ॒थि॒व्याः। स॒ꣳस्पृश॒ इति॑ स॒म्ऽस्पृशः॑। पा॒हि॒। अ॒र्चिः। अ॒सि॒। शो॒चिः। अ॒सि॒। तपः॑। अ॒सि॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
यमाय त्वा मखाय त्वा सूर्यस्य त्वा तपसे देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु पृथिव्याः सँस्पृशस्पाहि । अर्चिरसि शोचिरसि तपो सि ॥

यमाय। त्वा। मखाय। त्वा। सूर्य्यस्य। त्वा। तपसे। देवः। त्वा। सविता। मध्वा। अनक्तु। पृथिव्याः। सꣳस्पृश इति सम्ऽस्पृशः। पाहि। अर्चिः। असि। शोचिः। असि। तपः। असि॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र में 'दध्यङ' से प्रभु कहते हैं कि १. (त्वा) = तुझे मैंने इस संसार में (यमाय) = संयम के लिए रक्खा है। तेरा जीवन आत्मसंयमवाला हो । संसार के विषय तेरी इन्द्रियों व मन को सदा अपनी ओर आकृष्ट करेंगे, तूने उनमें आसक्त नहीं हो जाना। २. (त्वा) = तुझे मैंने मखाय यज्ञ के लिए इस संसार में भेजा है। तूने अपना जीवन यज्ञमय बनाने का प्रयत्न करना। यज्ञ 'मख' है [मा+ख] यह तेरे सब दोषों को दूर करेगा। यज्ञ करने पर दोष तुझमें आएँगे ही नहीं। ३. (त्वा) = तुझे (सूर्यस्य तपसे) = सूर्य के तप के लिए मैंने निश्चित किया है। तूने सूर्य के समान ही तपस्वी होना है। सूर्य ने एक बार घोड़े रथ में जोते, तो खोले ही नहीं। यह सूर्य निरन्तर क्रियाशील है, यह आराम नहीं करता। तूने भी सतत क्रियाशील बनना है, आराम नहीं करने लगना, क्रियाशीलता ही तप है, यह तुझे दीप्त करेगी, सूर्य की तरह चमकानेवाली होगी ४. सविता (देवः) = सबका प्रेरक, दिव्यता का पुञ्ज प्रभु (त्वा) = तुझे (मध्वा) = माधुर्य से (अनक्तु) = अलंकृत करे। तेरा जीवन 'संयत, यज्ञमय व क्रियाशील' होने के साथ माधुर्य से परिपूर्ण हो । तू किसी के प्रति कटु शब्दों का प्रयोग करनेवाला न हो। ५. (पृथिव्याः) = पृथिवी के (संस्पृशः) = संस्पर्श से (पाहि) = अपने को तू बचा। तू इन पार्थिव भोगों में आसक्त न हो जा। ये भोग तुझे भोगनेवाले प्रमाणित होंगे। तू इनमें आसक्त हुआ कि इनका शिकार हुआ। ५. यदि तू इस प्रकार पार्थिव भोगों में न फँसा तो सचमुच तू (अर्चिः असि) = [अर्च पूजायाम्] सच्चा पुजारी है। प्रभु की उपासना का सबसे प्रबल प्रमाण पार्थिव पदार्थों में प्रसक्त न होना ही है। (शोचि: असि) = [शुच्] तू अपने जीवन को पवित्र बनानेवाला है। पार्थिव भोगों में आसक्ति ही सब अपवित्रता का मूल है। (तपः असि) = पार्थिव भोगों में न फँसा तो तू सचमुच तपस्वी है। भोगासक्ति से ऊपर उठना महान् तपस्या है। 'तपस्वी होना' भोगासक्ति के अभाव का स्वरूप है, इसका परिणाम पवित्रता है और इससे स्वतः हो जानेवाली क्रिया प्रभुपूजा है।
Essence
भावार्थ - हम 'संयमी, यज्ञमय, क्रियाशील, माधुर्य से परिपूर्ण, पार्थिव भोगों के प्रति अनासक्त तथा प्रभुपूजक, पवित्र व तपस्वी बनें।
Subject
संयम, यज्ञ व तप