Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 36 / Mantra 8

24 Mantra
36/8
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- द्विपादद्विराड् गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रो॒ विश्व॑स्य राजति।शन्नो॑ऽअस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥८॥

इन्द्रः॑। विश्व॑स्य। रा॒ज॒ति॒ ॥ शम्। नः॒। अ॒स्तु॒। द्वि॒पद॒ इति॑ द्वि॒ऽपदे॑। शम्। चतु॑ष्पदे। चतुः॑पद॒ इति॑ चतुः॑ऽपदे ॥८ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो विश्वस्य राजति । शन्नो अस्तु द्विपदे शञ्चतुष्पदे ॥

इन्द्रः। विश्वस्य। राजति॥ शम्। नः। अस्तु। द्विपद इति द्विऽपदे। शम्। चतुष्पदे। चतुःपद इति चतुःऽपदे॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इन्द्रः) = वह सर्वशक्तिमान्, सब असुरों को दूर भगानेवाला प्रभु (विश्वस्य) = सारे ब्रह्माण्ड का तथा इस संसार में प्रविष्ट [विश्] सब प्राणियों का राजति शासन व व्यवस्था करता है। जिस दिन हम प्रभु के अध्यात्मशासन का अनुभव करेंगे, उस दिन (नः) = हम (द्विपदे) = दो पाँवों से गति करनेवाले मनुष्यों के लिए (शम्) = शान्ति होगी तथा (चतुष्पदे शम्) = चौपयों, अर्थात् पशुओं के लिए भी शान्ति होगी। वस्तुतः इस अध्यात्मशासन में मनुष्यों के परस्पर संघर्ष का तो प्रश्न ही नहीं, पशुओं से उनका किसी प्रकार का द्वेष न होगा, अर्थात् सिंहादि पशु भी मनुष्य के साथ शान्ति से चलेंगे। वन्य न रहकर वे भी पालतू हो जाएँगे, चिड़िया घर की वस्तु हो जाएँगे। योगदर्शन का ('अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः') = यह सूत्र स्थूलरूप धारण करता हुआ दृष्टिगोचर होगा, २. परन्तु इस अध्यात्मराज्य को ला वही व्यक्ति सकता है जो 'दध्यङ्'- प्रभु का ध्यान करनेवाला है, जो 'आथर्वण' स्थिरवृत्ति का होने से सभी को समान राज्य में रहनेवाला अपना साथी समझता है। सर्वत्र अनुभव करें और सब प्राणियों के साथ
Essence
भावार्थ- हम उस ईश के साम्राज्य का शान्ति से चलने की मनोवृत्तिवाले बनें।
Subject
एकशासन- विश्वशान्ति व विश्वनागरिकता