Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 36 / Mantra 12

24 Mantra
36/12
Devata- आपो देवताः Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑।शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः॥१२॥

शम्। नः॒। दे॒वीः। अ॒भिष्ट॑ये। आपः॑। भ॒व॒न्तु॒। पी॒तये॑ ॥ शंयोः। अ॒भि। स्र॒व॒न्तु॒। नः॒ ॥१२ ॥

Mantra without Swara
शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शँयोरभि स्रवन्तु नः ॥

शम्। नः। देवीः। अभिष्टये। आपः। भवन्तु। पीतये॥ शंयोः। अभि। स्रवन्तु। नः॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. आपः शब्द सर्वव्यापक [आप्= व्याप्तौ ] प्रभु के लिए भी प्रयुक्त होता है। ये दिव्य गुणोंवाले प्रभु [देवी :] (नः) = हमारे लिए (शम्) = शान्ति देनेवाले (अभिष्टये) = इष्ट प्राप्ति के लिए तथा (पतिये) = रक्षा के लिए (भवन्तु) = हों। ये प्रभु (शंयोः) = शान्ति देनेवाले तथा मलों को दूर करनेवाले (नः) = हमारे (अभि) = दोनों ओर अन्दर व बाहर (स्स्रवन्तु) = गतिवाले हों। इस प्रकार मन्त्र का यह अर्थ प्रभुपरक है। जब 'आप' शब्द जलवाचक होकर प्रयुक्त होता है तब मन्त्रार्थ निम्न प्रकार से होता है। २. (देवी: आप:) = दिव्य गुणोंवाले जल (नः) = हमें (शम्) = शान्ति देनेवाल हों। (अभिष्टये) = रोगों पर आक्रमण के लिए और (पीतये) = रक्षा के लिए (भवन्तु) = हों । (शंयोः) = शान्ति को देनेवाले तथा रोगों को दूर करनेवाले ये जल (नः) = हमारे (अभि) = अन्दर व बाहर (स्रवन्तु) = बहें। ३. जलों के अन्दर अद्भुत दिव्यगुण हैं। ये सब रोगों को दूर करनेवाले हैं। ('आपः सर्वस्य मेषजी:') = जल सब रोगों के औषध हैं। ('अप्सु मे सोमो अब्रवीत्, अन्तः विश्वानि भेषजा') = मुझे सोम ने यह बतलाया है कि जलों में सब औषध हैं। जलों का नाम ही 'भेषजम्' है। ये वारि हैं (निवारयन्ति रोगान्) = रोगों को दूर करते हैं । ४. ये जल (आपः) = व्यापक हैं। प्रत्येक पदार्थ में इनकी सत्ता है। प्राण के साथ इनकी सत्ता अनिवार्य है। प्राण अपोमय ही हैं । ५. ये रोगों पर आक्रमण के लिए होकर हमारी मृत्यु से रक्षा करते हैं। जल के प्रयोग से जलचिकित्सक रोगमात्र को दूर कर देता है । ६. इनका अन्दर व बाहर प्रयोग हमारे लिए शान्तिकर हो । 'अन्दर के लिए गरम व बाहर के लिए ठण्डा' यह सामान्य नियम है, जिसकी सामान्यतः मनुष्य सदा अवहेलना करता है, हम पीने में बर्फ का प्रयोग करते हैं, स्नान के लिए पानी को गरम करते हैं। ये दोनों ही बातें हानिकर हैं।
Essence
भावार्थ-जलों के ठीक प्रयोग से हम स्वस्थ बनकर शान्ति-लाभ करें।
Subject
जल व स्वास्थ्य