Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 8

22 Mantra
35/8
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
शं वातः॒ शꣳ हि ते॒ घृणिः॒ शं ते॑ भव॒न्त्विष्ट॑काः।शं ते॑ भवन्त्व॒ग्नयः॒ पार्थि॑वासो॒ मा त्वा॒भि शू॑शुचन्॥८॥

शम्। वातः॑। शम्। हि। ते॒। घृणिः॑। शम्। ते॒। भ॒व॒न्तु॒। इष्ट॑काः ॥ शम्। ते॒। भ॒व॒न्तु॒। अ॒ग्नयः॑। पार्थि॑वासः। मा। त्वा॒। अ॒भि। शू॒शु॒च॒न् ॥८ ॥

Mantra without Swara
शं वातः शँ हि ते घृणिः शन्ते भवन्त्विष्टकाः । शन्ते भवन्त्वग्नयः पार्थिवासो मा त्वाभिशूशुचन् ॥

शम्। वातः। शम्। हि। ते। घृणिः। शम्। ते। भवन्तु। इष्टकाः॥ शम्। ते। भवन्तु। अग्नयः। पार्थिवासः। मा। त्वा। अभि। शूशुचन्॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गतमन्त्र के अनुसार जब मनुष्य देवयानमार्ग पर चलता है तब उसे किसी प्रकार की आधिदैविक आपत्ति प्राप्त नहीं होती। उसके लिए सब प्राकृतिक देव अनुकूल होते हैं। इस विषय को आठवें व नौवें मन्त्र में इस प्रकार कहते हैं कि १. (वातः शम्) = वायु तेरे लिए शान्ति देनेवाली हो । २. (घृणि:) = [घृ-दीप्ति, A ray of light, sunshine, the sun ] सूर्यकिरणें, धूप तथा स्वयं सूर्य (ते) = तेरे लिए (हि) = निश्चयपूर्वक (शम्) = शान्ति देनेवाला हो । ३. (घृणि:) = [A wave, water] जलतरंगें तथा जल तेरे लिए शान्तिदायक हो। ४. (इष्टकाः) = यज्ञवेदी में चयन की गई ईंटें अथवा दिन तथा रात्रि [अहोरात्राणि वा इष्टकाः - श० ९।१।२।१९] (ते) = तेरे लिए (शं भवन्तु) = शान्ति देनेवाले हों । ५. (ते) = तेरे लिए (पार्थिवासः अग्नयः) = ये पृथिवीलोक की अग्नियाँ (शम् भवन्तु) = शान्ति देनेवाली हों। यहाँ 'अग्नयः' यह बहुवचन पृथिवी के ग्यारह देवों का ध्यान करके रखा गया है। अग्नि इनका मुखिया है, अतः सभी को 'अग्नि' कह दिया है। ६. ये सबके सब (त्वा) = तुझे (मा) = मत (अभिशूशुचन्) = शोकयुक्त करनेवाले हों।
Essence
भावार्थ- हम सातवें मन्त्र के अनुसार मन को मार लेने- [पूर्णरूप से काबू कर लेने] - वाले मृत्यु बनेंगे और देवयानमार्ग को अपनाएँगे तो सब देव हमारे लिए शान्तिकर होंगे।
Subject
आधिदैविक शान्ति