Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 19

22 Mantra
35/19
Devata- जातवेदाः देवताः Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क्र॒व्याद॑म॒ग्निं प्र हि॑णोमि दू॒रं य॑म॒राज्यं॑ गच्छतु रिप्रवा॒हः।इ॒हैवायमित॑रो जा॒तवे॑दा दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं व॑हतु प्रजा॒नन्॥१९॥

क्र॒व्याद॒मिति॑ क्रव्या॒ऽअद॑म्। अ॒ग्निम्। प्र। हि॒नो॒मि॒। दू॒रम्। यम॒राज्य॒मिति॑ यम॒ऽराज्य॑म्। ग॒च्छ॒तु। रि॒प्र॒वा॒ह इति॑ रिप्रऽवा॒हः ॥ इ॒ह। ए॒व। अ॒यम्। इत॑रः। जा॒तवे॑दा॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दाः। दे॒वेभ्यः॑। ह॒व्यम्। व॒ह॒तु॒। प्र॒जा॒नन्निति॑ प्रऽजा॒नन् ॥१९ ॥

Mantra without Swara
क्रव्यादमग्निम्प्र हिणोमि दूरँयमराज्यङ्गच्छतु रिप्रवाहः । इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यँवहतु प्रजानन् ॥

क्रव्यादमिति क्रव्याऽअदम्। अग्निम्। प्र। हिनोमि। दूरम्। यमराज्यमिति यमऽराज्यम्। गच्छतु। रिप्रवाह इति रिप्रऽवाहः॥ इह। एव। अयम्। इतरः। जातवेदा इति जातऽवेदाः। देवेभ्यः। हव्यम्। वहतु। प्रजानन्निति प्रऽजानन्॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (क्रव्यादम्) = कच्चे मांस [क्रव्य] को खानेवाले [अद] (अग्निम्) = अग्नि को (दूरम्) = दूर (प्रहिणोमि) = भेजता हूँ, अर्थात् हमारे घरों में कोई भी अपरिपक्व अवस्थावाला व्यक्ति मृत्यु का ग्रास नहीं होता । 'सस्यमिव मर्त्यः पच्यते ' - 'सस्य की भाँति मनुष्य परिपक्व होता है' ये उपनिषद् के शब्द परिपक्व की भावना को व्यक्त कर रहे हैं। 'इसके बाल पक गये हैं' यह हिन्दी का प्रयोग भी पकने का अर्थ स्पष्ट कर देते हैं, अर्थात् हमारे घरों में पूर्ण वृद्धावस्था से पूर्व कोई भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त नहीं होता। 'जरदष्टिं त्वा कृणोभि' = प्रभु ने मनुष्य को पूर्ण आयुष्य प्राप्त करनेवाला बनाया है। २. यह (रिप्रवाह:) = मलों व दोषों [रिप्र] को धारण करनेवाला [वह्] (यमराज्यम्) = यम के राज्य को (गच्छतु) = जाए। ('आचार्यो मृत्युर्वरुणः') = इस अथर्व वाक्य के अनुसार आचार्य ही मृत्यु व यम है। यम- आचार्य उसे बड़े नियम में रक्खेगा। बालकों में 'स्वार्थ, जिद' इत्यादि की भावना बड़ी प्रबल होती है, शिक्षणालयों में उन्हें ' औरों के साथ मिलकर चलना', 'अपने को ही सबसे महत्त्वपूर्ण न समझना' इत्यादि भावनाओं की शिक्षा मिलती है। यहीं इन गुणों का विकास होता है और ये शिक्षित व सभ्य बनते हैं। ३. जहाँ हम चञ्चल बच्चों को आर्चायकुल में भेजते हैं, वहाँ यह भी चाहते हैं कि (अयम्) = यह (इतर:) = उस चञ्चल बच्चे से भिन्न, (देवेभ्यः) = आचार्यकुल में विद्वान् उपाध्यायों से (जातवेदा:) = उत्पन्न हुए हुए ज्ञानवाला (इह एव) = यहाँ हमारे मध्य में ही, अर्थात् आचार्यकुल से शिक्षित हो समावृत होकर घरों में आये। ४. वह (प्रजानन्) = प्रकृष्ट ज्ञानवाला ब्रह्मचारी (हव्यम्) = ग्रहण करने योग्य विज्ञान को (वहतु) = औरों तक ले जानेवाला हो । यह लोगों में अपने प्राप्त किये हुए ज्ञान को फैलानेवाला हो ।
Essence
भावार्थ - [क] हमारे घरों में कोई छोटी उम्र में न चला जाए, [ख] हमारा प्रत्येक बालक आर्चायकुल में शिक्षा प्राप्त करे [ग] विद्वान् उपाध्यायों से शिक्षित होकर वह यहाँ ही हो, अर्थात् घर का निर्माण करनेवाला हो, [घ] अपने जीवन के अन्तकाल में औरों में उस ज्ञान को फैलानेवाला बने।
Subject
चार बातें