Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 16

22 Mantra
35/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वैखानस ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्न॒ऽआयू॑षि पवस॒ऽ आ सु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः।आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुना॑म्॥१६॥

अग्ने॑। आयू॑षि। प॒व॒से॒। आ। सु॒व। ऊर्ज॑म्। इष॑म्। च॒। नः॒ ॥ आ॒रे। बा॒ध॒स्व॒। दु॒च्छुना॑म् ॥१६ ॥

Mantra without Swara
अग्नऽआयूँषि पवस्वऽआ सुवोर्जमिषञ्च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥

अग्ने। आयूषि। पवसे। आ। सुव। ऊर्जम। इषम्। च। नः॥ आरे। बाधस्व। दुच्छुनाम्॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का अन्तिम वाक्य था कि 'अपनी उत्तमता व दिव्यता के पूरण के हेतु से रुद्र प्रभु को हृदयों में धारण करो।' वे हृदयस्थ प्रभु सुननेवाले को जो प्रेरणा देते हैं उसका वर्णन गत मन्त्र में विस्तार से है। प्रस्तुत मन्त्र में दिव्यता का आदाता 'आदित्यदेव' जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि १. हे (अग्ने) = हमारी सब बुराइयों को भस्म करनेवाले अग्निदेव ! आप ही हमारे (आयूंषि) = जीवनों को (पवसे) = पवित्र बनाते हैं। काम-क्रोधादि आसुर वृत्तियों से युद्ध में जीतने का सामर्थ्य हममें नहीं है। यह तो आपकी शक्ति से ही होगा। २. (नः) = हमें (इषम्) = प्रेरणा को (ऊर्जम् च) = और उस प्रेरणा को क्रियान्वित करने के लिए प्राणशक्ति को (आसुव) = प्राप्त कराइए। जीवनों को पवित्र करने के लिए यही मार्ग है कि हम प्रेरणा को सुनें और उस प्रेरणा को क्रियान्वित करने की शक्ति हममें हो। ३. हे प्रभो! (दुच्छुनाम्) [शुन गतौ] = सब दुर्गमनों, दुरितों को आरे हमसे दूर (बाधस्व) = रोक दीजिए। हे प्रभो! यह सब आपने ही करना है, हमारी शक्ति से यह साध्य नहीं ।
Essence
भावार्थ- हमारे जीवन पवित्र हों, हमें प्रेरणा व शक्ति प्राप्त हो, दुरित हमसे दूर रहें ।
Subject
'आदित्यदेवों' की प्रार्थना