Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 15

22 Mantra
35/15
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मं जी॒वेभ्यः॑ परि॒धिं द॑धामि॒ मैषां॒ नु गा॒दप॑रो॒ऽअर्थ॑मे॒तम्।श॒तं जी॑वन्तु श॒रदः॑ पुरू॒चीर॒न्तर्मृ॒त्युं द॑धतां॒ पर्व॑तेन॥१५॥

इ॒मम्। जी॒वेभ्यः॑। प॒रि॒धिमिति॑ परि॒ऽधिम्। द॒धा॒मि॒। मा। ए॒षा॒म्। नु। गा॒त्। अप॑रः। अर्थ॑म्। ए॒तम् ॥ श॒तम्। जी॒व॒न्तु॒। श॒रदः॑। पु॒रू॒चीः। अ॒न्तः। मृ॒त्युम्। द॒ध॒ता॒म्। पर्व॑तेन ॥१५ ॥

Mantra without Swara
इमञ्जीवेभ्यः परिधिन्दधामि मैषान्नु गादपरो अर्थमेतम् । शतथ्जीवन्तु शरदः पुरूचीरन्तर्मृत्युन्दधताम्पर्वतेन् ॥

इमम्। जीवेभ्यः। परिधिमिति परिऽधिम्। दधामि। मा। एषाम्। नु। गात्। अपरः। अर्थम्। एतम्॥ शतम्। जीवन्तु। शरदः। पुरूचीः। अन्तः। मृत्युम्। दधताम्। पर्वतेन॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र की समाप्ति इन शब्दों पर थी कि हम उत्तम ज्योति परमात्मा को प्राप्त करते हैं, जो प्रभु 'सूर्य' हैं, हमें कर्मों में प्रेरित कर रहे हैं। इस प्रेरणा का स्वरूप प्रस्तुत मन्त्र में दिया गया है। १. (जीवेभ्यः) = जीवों के लिए (इमम् परिधिम्) = इस परिधि को, मर्यादा को (दधामि) = धारण करता हूँ। जीव को सर्वप्रथम तो यह चाहिए कि वह मर्यादा में चले । उसका प्रत्येक कार्य सीमा में हो। २. दूसरी प्रेरणा प्रभु की यह है कि (एषाम्) = इन जीवों के (एतम् अर्थम्) = इस धन को उपार्जित सम्पत्ति को (अपरः) = दूसरा व्यक्ति (मा नु गात्) = निश्चय से न प्राप्त करे, अर्थात् सब कोई अपने पुरुषार्थ से ही धनार्जन का विचार करे। ३. प्रेरणा का तीसरा अंश यह है कि जीव (शरदः शतम्) = सौ वर्षपर्यन्त (जीवन्तु) = जीएँ । सौ वर्ष तक जीने को भी वह अपना धर्म समझें । दीर्घजीवन के दृष्टिकोण से उनका आहर - विहार हो । ४. इस जीवन में प्रजाएँ (पुरूची:) [पुरु अञ्च्] = पालन व पूरणात्मक गतिवाले होते हुए प्रभु की पूजा करनेवाले हों [पृ पालनपूरणयो:, अञ्चु गतिपूजनयोः] प्रभु-पूजा वस्तुतः यही है' कि हमारे कर्म पालन व पूरण करनेवाले हों, विनाश व ह्रास का कारण न बनें। ५. ये जीव (पर्वतेन) [पर्व पूरणे] = इस पूरण के हेतु से, कमियों को न आने देने की लिए (अन्तः) = अपने हृदयों में (मृत्युम्) = उस सर्वत्र यन्ता यमरूप प्रभु को (दधताम्) = धारण करें। रुद्ररूप में उस प्रभु का स्मरण हमारे जीवनों में न्यूनताओं को नहीं आने देता। यह 'मृत्यु' का स्मरण हमारी जीवन की गाड़ी को पथभ्रष्ट नहीं होने देता, हम प्रकृति में नहीं फँसते। बस, इस प्रकृति में न फँसने के कारण ही हम उत्तम गतिवाले होते हैं [सम्-उत्तम, कसु गतौ] अन्त में हम प्रभु को प्राप्त करते हैं [कस् to approach], इसीलिए हमारा नाम 'सङ्कसुक' हो जाता है।
Essence
भावार्थ - प्रभु की प्रेरणा इस रूप में है कि १. मर्यादा में चलो, २. पुरुषार्थ से कमाओ, ३. सौ वर्ष अवश्य जीना है, ४. तुम्हारी प्रत्येक क्रिया पालन व पूरणवाली हो, ५. पूरण के दृष्टिकोण से ही प्रभु के 'रुद्र' रूप को हृदयस्थ करना, मृत्यु को नहीं भूलना।
Subject
प्रेरणा-पञ्चक-पाँच प्रेरणाएँ