Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 13

22 Mantra
35/13
Devata- सूर्य्यो देवता Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒न॒ड्वाह॑म॒न्वार॑भामहे॒ सौर॑भेयꣳ स्व॒स्तये॑।स न॒ऽइन्द्र॑ऽइव दे॒वेभ्यो॒ वह्निः॑ स॒न्तर॑णो भव॥१३॥

अ॒न॒ड्वाह॑म्। अ॒न्वार॑भामह॒ऽइत्य॑नु॒ऽआर॑भामहे। सौर॑भेयम्। स्व॒स्तये॑ ॥ सः। नः॒। इन्द्र॑ऽइ॒वेतीन्द्र॑ इव। दे॒वेभ्यः॑। वह्निः॑। स॒न्तर॑ण॒ इति॑ स॒म्ऽतर॑णः। भ॒व॒ ॥१३ ॥

Mantra without Swara
अनड्वाहमन्वारभामहे सौरभेयँ स्वस्तये । स नऽइन्द्रऽइव देवेभ्यो वह्निः सन्तरणो भव ॥

अनड्वाहम्। अन्वारभामहऽइत्यनुऽआरभामहे। सौरभेयम्। स्वस्तये॥ सः। नः। इन्द्रऽइवेतीन्द्र इव। देवेभ्यः। वह्निः। सन्तरण इति सम्ऽतरणः। भव॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
दसवें मन्त्र में ' अश्मन्वती नदी' के तैरने का उल्लेख था। उसी सन्तरण के लिए प्रभु से शक्तियोग का निश्चय करते हैं कि (अनड्वाहम्) = इस संसार शकट [अन-गाड़ी] के वहन [वाह] करनेवाले प्रभु को (आरभामहे) = अपना आधार [ to rely on ] बनाते हैं, उनपर अपनी जीवन - यात्रा की सफलता के लिए पूर्ण आस्था [ to reach or attain to] रखते हैं। उस प्रभु को प्राप्त करने के लिए [to seize, to grasp ] पूर्ण प्रयत्न करते हैं। उस प्रभु को समझने के लिए कोई कमी उठा नहीं रखते। वे प्रभु (सौरभेयम्) = सुरभियों में उत्तम हैं, हमारे जीवन को सुगन्धित कर देते हैं। प्रभु का आश्रय करने पर हमारे जीवन पवित्र हो जाते हैं, उनमें पापमय कर्मों की दुर्गन्ध नहीं रहती। ऐसा हम (स्वस्तये) = उत्तम जीवन की स्थिति के लिए करते हैं [सु+अस्] । वे प्रभु 'वह्नि' हैं, हमारी जीवन-यात्रा को पूरा करनेवाले हैं। हमें लक्ष्यस्थान पर ले जाते हैं [वह्नि to carry ] । हे प्रभो! आप हमारे लिए (सन्तारण:) = इस संसार - नदी को तैरने के साधन (भव) = होओ, (इव) = उसी प्रकार जैसेकि (इन्द्रः) = देवराट् (देवेभ्यः) = देवताओं के लिए सन्तरण हुआ करता है। इस शरीर में 'इन्द्र' आत्मा है और सब इन्द्रियाँ 'देव' हैं। जब इन्द्र इन देवों पर आक्रमण करनेवाले असुरों का संहार करता है तब देव, अर्थात् इन्द्रियाँ सब मलिनताओं को पार कर जाती हैं। मलिनताओं से ऊपर उठकर देव चमक उठते हैं। इसी प्रकार प्रभु का आश्रय करने पर जीव चमक उठता है। प्रभु का दिव्य आश्रय करनेवाले ये लोग अच्छाइयों का ग्रहण करने के कारण 'आदित्य' होते हैं, गुणोंवाले होने से 'देव' होते हैं। वे देव उस प्रभु को ही 'अनड्वान्' = संसार - शकट का सञ्चालक समझते हैं।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु को ही जीवन सञ्चालक जानें। वे हमारे जीवन को पवित्र बनाएँगे, वे हमें इस संसार नदी को तैरने के योग्य करेंगे।
Subject
'वह अनड्वान्'