Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 35 / Mantra 11

22 Mantra
35/11
Devata- आपो देवताः Rishi- आदित्या देवा ऋषयः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अपा॒घमप॒ किल्वि॑ष॒मप॑ कृ॒त्यामपो॒ रपः॑।अपा॑मार्ग॒ त्वम॒स्मदप॑ दुः॒ष्वप्न्य॑ꣳ सुव॥११॥

अप॑। अ॒घम्। अप॑। किल्वि॑षम्। अप॑। कृ॒त्याम्। अपो॒ऽइत्यपोः॑। रपः॑ ॥ अपा॑मार्ग। अप॑मा॒र्गेत्यप॑ऽमार्ग। त्वम्। अ॒स्मत्। अप॑। दुः॒ष्वप्न्य॑म्। दुः॒ष्वप्न्य॒मिति॑ दुः॒ऽस्वप्न्य॑म्। सु॒व॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
अपाघमप किल्विषमप कृत्यामपो रपः । अपामार्ग त्वमस्मदप दुःष्वप्न्यँ सुव ॥

अप। अघम्। अप। किल्विषम्। अप। कृत्याम्। अपोऽइत्यपोः। रपः॥ अपामार्ग। अपमार्गेत्यपऽमार्ग। त्वम्। अस्मत्। अप। दुःष्वप्न्यम्। दुःष्वप्न्यमिति दुःऽस्वप्न्यम्। सुव॥११॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. [अप-away, दूर तथा मार्ग [मृजू शुद्धौ] शोधन करनेवाला] (अपामार्ग) = हमसे पापों को दूर करके हमें शुद्ध करनेवाले हे प्रभो! (त्वम्) = आप (अघम्) = हिंसादि पापों को (अस्मत्) = हमसे (अपसुव) = दूर कीजिए । जब हम प्रभु का स्मरण करते हैं तब सभी प्राणियों के प्रभु-सन्तान होने की कल्पना से विश्वबन्धुत्व की भावना जागती है और हम हिंसा की वृत्ति से ऊपर उठते हैं । ३. हे प्रभो! (किल्बिषम्) = उस मन की मलिनता को जो हमें विषय-वासनाओं में ही क्रीड़ा कराती रहती है अप हमसे दूर कीजिए । प्रभु स्मरण से मन से वासना भाग ही जाती है और मन विषयप्रवण नहीं रहता। ३. (कृत्याम्) = औरों को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से जो जादू-टोना आदि दुष्ट क्रियाएँ हैं, उन्हें (अप) = हमसे दूर कीजिए । प्रभु-भावन हमारे हृदयों को पवित्र करता है, अतः हृदय में ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहते और उनकी परिणामभूत कृत्याएँ भी समाप्त हो जाती हैं। ४. (उ) = और (रप:) = जो भाषण - सम्बन्धी दोष हैं, उन कटु भाषणादि को अप हमसे दूर कीजिए । प्रभु स्मरण से भ्रातृभाव का उदय होता है, कटुभाषण का प्रसङ्ग ही नहीं रहता। ५. हे अपामार्ग प्रभो! (अस्मत्) = हमसे (दुःष्वप्न्यम्) = अशुभ स्वप्नों की कारणभूत सब बुराइयों को (अपसुव) = दूर कीजिए। सब पापों को दूर करके जीवन में सुख का निर्माण करनेवाला (शुनःशेप) = [शुनम् = सुखम् शेप = to make ] प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है। यह 'अपामार्ग' ओषधि के प्रयोग को समझकर जिस प्रकार शरीर को नीरोग बनाता है, उसी प्रकार उस (अपामार्ग) = प्रभु के स्मरण से यह अपने मन को निर्दोष बनाता है।
Essence
भावार्थ- प्रभु अपामार्ग हैं, वे हमारे अघों, किल्बिषों, कृत्याओं और रपस् को हमसे दूर करते हैं। संक्षेप में बुरे स्वप्नों की कारणभूत सब बातों को वे प्रभु हमसे दूर करते हैं।
Subject
अपामार्ग