Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 9

58 Mantra
34/9
Devata- अनुमतिर्देवता Rishi- अगस्त्य ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अनु॑ नो॒ऽद्यानु॑मतिर्य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ मन्यताम्।अ॒ग्निश्च॑ हव्य॒वाह॑नो॒ भव॑तं दा॒शुषे॒ मयः॑॥९॥

अनु॑। नः॒। अ॒द्य। अनु॑मति॒रित्यनु॑ऽमतिः। य॒ज्ञम्। दे॒वेषु॑। म॒न्य॒ता॒म् ॥ अ॒ग्निः। च॒। ह॒व्य॒वाह॑न॒ इति॑ हव्य॒ऽवाह॑नः। भव॑तम्। दा॒शुषे॑ मयः॑ ॥९ ॥

Mantra without Swara
अनु नोद्यानुमतिर्यज्ञन्देवेषु मन्यताम् । अग्निश्च हव्यवाहनो भवतन्दाशुषे मयः ॥

अनु। नः। अद्य। अनुमतिरित्यनुऽमतिः। यज्ञम्। देवेषु। मन्यताम्॥ अग्निः। च। हव्यवाहन इति हव्यऽवाहनः। भवतम्। दाशुषे मयः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में कहा गया था कि अनुमति के होने पर 'शान्ति' रहती है। जिस घर में पति-पत्नी में अनुमति है, वह घर स्वर्ग बन जाता है। इसी 'अनुमति' का उल्लेख करते हुए प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि अनुमतिः शान्ति व उन्नति की साधनभूत यह 'अनुमति' = [प्रेम का विचार] (अद्य) = आज (नः) = हमारे (देवेषु यज्ञम्) = देवताओं में निवास करनेवाला जो यज्ञ है, उसका (अनुमन्यताम्) = अनुकूल बोध दे, अर्थात् हमारे विचारों को 'अनुमति' यज्ञानुकूल बनाये। देवता लोग यज्ञमय जीवन बिताते हैं, वही यज्ञ 'अनुमति' की कृपा से हमें प्रिय हो । हमारी मनोवृत्ति आज से यज्ञ प्रवण हो जाए। 'यज्ञ' का पूर्ण अर्थ यह है कि हम [क] सदा बड़ों का आदर करें [देवपूजा], [ख] सब साथियों के साथ बड़े प्रेम से मिलकर चलनेवाले बनें [ संगतिकरण] तथा [ग] सदा ही कुछ-न-कुछ देनेवाले बने रहें [दान], [घ] इस दान को ही जब हमें इन वायु आदि देवों के लिए करना होता है तब हम इन देवों के मुखरूप अग्नि में हव्य पदार्थों को डालते हैं। यही अग्निहोत्र कहलाता है और यज्ञ का अर्थ संकुचित रूप में यही लिया जाता है। देव लोग तो यज्ञमय जीवनवाले हैं ही, हम भी अनुमति की कृपा से यज्ञमय जीवनवाले बनें, (च) = और (अग्निः) = देवों का मुख यह अग्नि (हव्यवाहनः) = हमारे द्वारा दिये गये हव्य पदार्थों को देवों में ले जानेवाला बने। इस प्रकार हे अनुमते और अग्ने ! आप दोनों (दाशुषे) = इस दाशवान् के लिए (मय:) = कल्याणकर (भवतम्) = होओ। 'दाशवान्' पुरुष वह है [ दाशृ दाने] जो देनेवाला है और अन्त में जो अपने को प्रभु के प्रति दे डालता है, यह समर्पण की वृत्तिवाला पुरुष दाश्वान् कहलाता है। प्रभु प्रवण व्यक्ति कभी किसी से लड़ता नहीं, यह सदा सबके साथ प्रेम से चलता है, यज्ञशील तो होता ही है । 'अनुमति व अग्नि की कृपा से यह 'अगं पापं संहन्ति - स्त्यायति' = पाप को नष्ट करके अगस्त्य बन जाता है।
Essence
भावार्थ- हम सदा अनुमतिवाले हों और हमारे जीवन यज्ञमय बन जाएँ।
Subject
अनुमति और अग्नि