Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 8

58 Mantra
34/8
Devata- अनुमतिर्देवता Rishi- अगस्त्य ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अन्विद॑नुमते॒ त्वं मन्या॑सै॒ शं च॑ नस्कृधि।क्रत्वे॒ दक्षा॑य नो हिनु॒ प्र ण॒ऽआयू॑षि तारिषः॥८॥

अनु॑। इत्। अ॒नु॒म॒त॒ इत्यनु॑ऽमते। त्वम्। मन्या॑सै। शम्। च॒। नः॒। कृ॒धि॒ ॥ क्रत्वे॒॑। दक्षा॑य। नः॒। हि॒नु॒। प्र। नः॒। आयू॑षि। ता॒रि॒षः॒ ॥८ ॥

Mantra without Swara
अन्विदनुमते त्वम्मन्यासै शञ्च नस्कृधि । क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्र ण आयूँषि तारिषः ॥

अनु। इत्। अनुमत इत्यनुऽमते। त्वम्। मन्यासै। शम्। च। नः। कृधि॥ क्रत्वे। दक्षाय। नः। हिनु। प्र। नः। आयूषि। तारिषः॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सात्त्विक अन्न के सेवन से मनुष्य के अन्दर सदा 'अनुमति' = अनुकूल मति- उन्नति के लिए योग्य विचार उत्पन्न होते हैं। राजस् व तामस् अन्नों का परिणाम विरोधी विचारों का उत्पन्न होना, लड़ाई-झगड़े के विचारों का उत्पन्न होना है। सात्त्विक अन्न 'अनुमति' को जन्म देता है तो उससे भिन्न अन्न 'विमति' को जन्म देता है। विमति से परस्पर विरोध - विद्वेष बढ़ता है और उसका परिणाम मानस अशान्ति है। मानस अशान्ति के होने पर 'विषाद' उत्पन्न होता है, मनुष्य के मन में कर्मसंकल्प नहीं उठता, किसी काम को जी करता ही नहीं। ऐसी स्थिति उन्नति के लिए व बल-वृद्धि के लिए विघातक है, और दीर्घजीवन की विरोधी है ही। इस सारी बात को ध्यान में करके मन्त्र में 'अगस्त्य' ऋषि जिनका उद्देश्य सब प्रकार की ('अ-ग') = अगतिता को स्त्य समाप्त करना है, कहते हैं कि हे (अनुमते) = अनुकूलमते! (त्वम्) = तू (इत्) = निश्चय से (अनुमन्यासै) = हमपर अनुकूलमतिवाली हो, अर्थात् हम तेरे 'कृपापात्र' बने रहें । तू हमसे कभी दूर न हो (च) = और (नः) = हमारे लिए (शम्) = शान्ति को (कृधि) = कर | (नः) = हमें शान्त बनाकर (क्रत्वे) = सदा उत्तम कर्मसंकल्पों के लिए तथा (दक्षाय) = उन्नति के लिए हिनु प्रेरित कर। इस प्रकार हमें शान्त, कर्ममय, उन्नतिशील जीवनवाला बनाकर (न:) = हमारी आयूंषि आयुओं को (प्रतारिषः) = खूब लम्बा करना, हमें दीर्घ जीवनवाला बनाना ।
Essence
भावार्थ-यदि हम शुष्क वैर-विवाद से दूर रहकर अनुकूलितमति से चलते हैं तो हमें 'शान्ति, कर्मसंकल्प [कर्मसामर्थ्य], उन्नति तथा दीर्घजीवन' प्राप्त होता है।
Subject
अनुमति