Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 6

58 Mantra
34/6
Devata- मनो देवता Rishi- शिवसङ्कल्प ऋषिः Chhand- स्वराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒षा॒र॒थिरश्वा॑निव॒ यन्म॑नु॒ष्यान्ने॑नी॒यते॒ऽभीशु॑भिर्वा॒जिन॑ऽइव।हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यद॑जि॒रं जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥६॥

सु॒षा॒र॒थिः। सु॒सा॒र॒थिरिति॑ सुऽसार॒थिः। अश्वा॑नि॒वेत्यश्वा॑न्ऽइव। यत्। म॒नु॒ष्या᳖न्। ने॒नी॒यते॑। अ॒भीशु॑भि॒रित्य॒भीशु॑ऽभिः। वा॒जिन॑ऽइ॒वेति॑ वा॒जिनः॑ऽइव ॥ हृ॒त्प्रति॑ष्ठम्। हृ॒त्प्रतिस्थ॒मिति॑ हृ॒त्ऽप्रति॑स्थम्। यत्। अ॒जि॒रम्। जवि॑ष्ठम्। तत्। मे॒। मनः॑। शि॒वस॑ङ्कल्प॒मिति॑ शि॒वऽस॑ङ्कल्पम्। अ॒स्तु॒ ॥६ ॥

Mantra without Swara
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽइव। हृत्प्रतिष्ठँयदजिरञ्जविष्ठन्तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥

सुषारथिः। सुसारथिरिति सुऽसारथिः। अश्वानिवेत्यश्वान्ऽइव। यत्। मनुष्यान्। नेनीयते। अभीशुभिरित्यभीशुऽभिः। वाजिनऽइवेति वाजिनःऽइव॥ हृत्प्रतिष्ठम्। हृत्प्रतिस्थमिति हृत्ऽप्रतिस्थम्। यत्। अजिरम्। जविष्ठम्। तत्। मे। मनः। शिवसङ्कल्पमिति शिवऽसङ्कल्पम्। अस्तु॥६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इव) = जैसे (सुषारथिः) = उत्तम सारथि (वाजिनः) = शक्तिशाली अश्वान् घोड़ों को (अभीशुभिः इव) = जैसे लगामों से (नेनीयते) = खूब इधर-उधर ले जाता है, उसी प्रकार मन मनुष्यों को न जाने कहाँ-कहाँ ले जाता है। एक ही क्षण में पूर्व में है, तो अगले ही क्षण में पश्चिम में पहुँच जाता है, प्रथम क्षण में समुद्र तल में विचर रहा है तो अगले ही क्षण में पर्वत-शिखर पर पहुँचा होता है। चारों दिशाओं में भटकता है। यहाँ 'सु-सारथि' शब्द का उल्लेख बड़ा महत्त्वपूर्ण है। उत्तम सारथि घोड़ों को लक्ष्य की ओर ले जाता है, इसी प्रकार यह उत्तम बना हुआ मन मनुष्य को अवश्य लक्ष्य तक पहुँचानेवाला होता है। २. (हृत् प्रतिष्ठम्) = यह मन हृदय में प्रतिष्ठित है। 'हृदय' श्रद्धा का निवासस्थान है और श्रद्धा होने पर ही मन स्थिर होता है। जिस विषय में श्रद्धा होगी, उसी विषय में मन स्थिर हो पाएगा। आत्मतत्त्व में श्रद्धा हुई तो मन वहीं एकाग्र होगा। वृक्ष जैसे भूमि में प्रतिष्ठित है, भूमि से जड़ बाहर हुई और वृक्ष गिरा, इसी प्रकार मन श्रद्धा में प्रतिष्ठित है, श्रद्धा से रहित हुआ कि भटका । ३. यह मन (यत्) = जो (अजिरम्) = [agile] अत्यन्त क्रियाशील है (जविष्ठम्) = अत्यन्त वेगवान् है (तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु) = वह मेरा मन शिवसंकल्पवाला हो । मन सचमुच 'चञ्चल'- अत्यन्त चञ्चल है 'वायोरिव सुदुष्करम्' इसका स्थिर करना वायु को मुट्ठी में पकड़ने के समान है, परन्तु श्रद्धा होने पर स्थिर हो जाता है।
Essence
भावार्थ- हम अपने इस नितान्त चञ्चल मन को श्रद्धा द्वारा नियन्त्रित करनेवाले बनें।
Subject
हृदय में प्रतिष्ठित मन