Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 57

58 Mantra
34/57
Devata- ब्रह्मणस्पतिर्देवता Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- विराट् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र नू॒नं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्मन्त्रं॑ वदत्युक्थ्यम्।यस्मि॒न्निन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रोऽअ॑र्य॒मा दे॒वाऽओका॑सि चक्रि॒रे॥५७॥

प्र। नू॒नम्। ब्रह्म॑णः। पतिः॑। मन्त्र॑म्। व॒द॒ति॒। उ॒क्थ्य᳖म् ॥ यस्मि॑न्। इन्द्रः॑। वरु॑णः। मित्रः॒। अ॒र्य्य॒मा। दे॒वाः। ओका॑सि। च॒क्रि॒रे॒ ॥५७ ॥

Mantra without Swara
प्रनूनम्ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रँवदत्युक्थ्यम् । यस्मिन्निन्द्रो वरुणोऽमित्रो अर्यमा देवा ओकाँसि चक्रिरे ॥

प्र। नूनम्। ब्रह्मणः। पतिः। मन्त्रम्। वदति। उक्थ्यम्॥ यस्मिन्। इन्द्रः। वरुणः। मित्रः। अर्य्यमा। देवाः। ओकासि। चक्रिरे॥५७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्रों में कण्व की प्रार्थना थी कि 'ब्रह्मणस्पति का मेरे हृदय में उत्थान हो, मेरे हृदय में प्रभुभावना जागरित हो'। इसपर प्रभु ने कहा था कि 'मरुत्, सुदानु, इन्द्र, प्राशू सचा' बनकर तू मेरे समीप आ । यदि हम प्रभु के आदेशानुसार ऐसे बनकर प्रभु के समीप आते हैं तो हमारे हृदयस्थ वे (ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान के पति प्रभु (नूनम्) = निश्चय से (उक्थ्यम्) = ऊँचे-ऊँचे उच्चारण के योग्य प्रशंसनीय (मन्त्रम्) = मननीय ज्ञान से परिपूर्ण वेदवाक्यों का (प्रवदति) = खूब ही उच्चारण करते हैं। हम न सुनें तो यह हमारा दोष है, प्रभु तो उच्चारण कर ही रहे हैं। ये मन्त्र वे हैं (यस्मिन्) = जिसमें (इन्द्रः वरुणः मित्रः अर्यमा देवा:) = इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यया तथा अन्य सभी देव (ओकांसि) = अपने गृहों को (चक्रिरे) = बनाते है। इस मन्त्र में यह शक्ति है कि जहाँ यह मन्त्र होगा वहाँ देवों का भी निवास होगा। जहाँ हम हृदयस्थ प्रभु के मन्त्रों का ग्रहण करनेवाले बनते है, वहाँ हमारा जीवन इन देवों का निवास स्थान बन जाता है। ज्ञान की वाणियों के अध्ययन का यह परिणाम है कि मनुष्य १. (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय = इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनता है। उसकी इन्द्रियाँ विषयों में आसक्तिवाली नहीं होती। वे विषय-रस की तुच्छता को जानकर 'रसरूप' प्रभु की ओर चलनेवाली होती हैं । २. (वरुणः) = यह व्यक्ति द्वेष का निवारण करनेवाला होता है। ३. (मित्र:) = यह सबके प्रति स्नेह की वृत्ति से चलता है। ४. (अर्यमा) = [ अरीन् यच्छति ] यह 'काम, क्रोध व लोभ' रूप शत्रुओं का नियमन करनेवाला होता है। ५. (देवाः) = [देवो दानाद्वा दीपनाद्वा] यह दान की वृत्ति को अपनाता है, ज्ञान की दीप्ति से दीप्त होता है औरों को ज्ञान की दीप्ति से द्योतित करनेवाला होता है।
Essence
भावार्थ- हम हृदयस्थ ब्रह्मणस्पति प्रभु के उच्चरित मन्त्रों को सुनें, ज्ञानयज्ञों में प्रवृत्त हों, जिससे हमारा जीवन दिव्य गुणों की सम्पत्ति से परिपूर्ण हो, हम 'दैवी सम्पद्' को अपने में बढ़ा पाएँ ।
Subject
ब्रह्मणस्पति का मन्त्रोच्चारण