Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 56

58 Mantra
34/56
Devata- ब्रह्मणस्पतिर्देवता Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
उत्ति॑ष्ठ ब्रह्मणस्पते देव॒यन्त॑स्त्वेमहे।उप॒ प्र य॑न्तु म॒रुतः॑ सु॒दान॑व॒ऽइन्द्र॑ प्रा॒शूर्भ॑वा॒ सचा॑॥५६॥

उत्। ति॒ष्ठ॒। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। दे॒व॒यन्त॒ इति॑ देव॒ऽयन्तः॑। त्वा॒। ई॒म॒हे॒ ॥ उप॑। प्र। य॒न्तु॒। म॒रुतः॑। सु॒दा॑नव॒ इति॑ सु॒ऽदान॑वः। इन्द्र॑। प्रा॒शूः। भ॒व॒। सचा॑ ॥५६ ॥

Mantra without Swara
उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे । उपप्रयन्तु मरुतः सुदानवऽइन्द्र प्राशूर्भवा सचा ॥

उत्। तिष्ठ। ब्रह्मणः। पते। देवयन्त इति देवऽयन्तः। त्वा। ईमहे॥ उप। प्र। यन्तु। मरुतः। सुदानव इति सुऽदानवः। इन्द्र। प्राशूः। भव। सचा॥५६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हमारे जीवनों में सामान्यतः सांसारिक भावनाएँ प्रबल रूप से उठती रहती हैं। कभी काम की वासना उठ खड़ी हुई, कभी क्रोध प्रबल हो गया या लोभ ने हमें आ घेरा। इन वासनाओं के उठ खड़े होने पर दिव्य - भावनाओं का तो हमारे हृदयों से कूच हो ही जाता है। इनके जाने पर 'देव' वहाँ से चले जाते हैं, अतः 'कण्व' प्रार्थना करता है कि है (ब्रह्मणस्पते) = ज्ञान के पति प्रभो! (उत्तिष्ठ) = हमारे हृदयों में आपका ही भावन उठे। हम आपका ही चिन्तन करें। हमें आपकी कभी विस्मृति न हो। २. जिस प्रकार राजा के आने पर अन्य अधिकृत पुरुष उसके पीछे-पीछे स्वयं आ जाते हैं उसी प्रकार उस महान् देव के आने पर अन्य देव उसके साथ आएँगे ही, अतः (देवयन्तः) = देवों को अपनाने की कामना करते हुए हम (त्वा) = आपको (ईमहे) = चाहते हैं, प्राप्त करने की कामना करते हैं। मेरे हृदय में प्रभुभावना उठ खड़ी होगी तो 'आसुर भावनाएँ लुप्त हो जाएँगी। इतना ही नहीं, प्रत्युत सब दिव्य - भावनाएँ मेरी हृदयस्थली में अंकुरित हो उठेंगी। 'कण्व' की इस प्रार्थना पर प्रभु कहते हैं कि ३. (उपप्रयन्तु) = मेरे समीप आएँ। कौन? [क] (मरुतः) = प्राणों की साधना करनेवाले [मरुतः प्राणाः] परिमित बोलनेवाले [मितराविणः] तथा [ख] (सुदानवः) = उत्तम दान देनेवाले। वस्तुतः प्रभुभावना को जागरित करने के ये तीन साधन हैं- 'प्राणसाधना, बोलना और दानशील बनना।' पुनः प्रभु कहते हैं कि [ग] (इन्द्र) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! तू [घ] (प्राशूः) = [ प्र अश व्याप्ति] प्रकर्षेण कर्मों में व्याप्त होनेवाला हो। 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' इस आदेश को भूल नहीं। ' एवं त्वयि न अन्यथा इतः अस्ति'- ' यही मार्ग है, दूसरा नहीं' इस बात को भूलना नहीं और [ङ] फिर (सचाभवा) = सबके साथ मिलकर = कम चलनेवाला हो। तूने मोक्ष भी अकेले पाने की कामना नहीं करनी। सभी के कल्याण में अपना कल्याण समझना । इस जीवन यात्रा में वैर-विरोध से नहीं चलना । मुझे तो तू तभी प्राप्त करेगा जब सबके साथ तेरा प्रेमभाव होगा।
Essence
भावार्थ- मेधावी पुरुष प्रभुभावना को हृदय में सदा जागरित करता है, जिससे कि हृदय देवों का निवासस्थान बने। प्रभु प्राप्ति के उपाय इस प्रकार हैं १. प्राणसाधना करना, कम बोलना [मरुतः ] २. प्रकृति में न फँसना, खूब देनेवाला बनना [सुदानवः] ३. जितेन्द्रिय बनने का प्रयत्न करना [इन्द्र] ४. सदा उत्तम कर्मों में लगे रहना [प्राशुः ] ५. मिलकर चलना [सचा] 'सं गच्छध्वम्', इस उपदेश को क्रियान्वित करना ।
Subject
ब्रह्मणस्पति का उत्थान