Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 54

58 Mantra
34/54
Devata- आदित्या देवताः Rishi- कूर्म गार्त्समद ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मा गिर॑ऽआदि॒त्येभ्यो॑ घृ॒तस्नूः॑ स॒नाद्राज॑भ्यो जु॒ह्वड्टा जुहोमि।शृ॒णोतु॑ मि॒त्रोऽअ॑र्य॒मा भगो॑ नस्तुविजा॒तो वरु॑णो॒ दक्षो॒ऽअꣳशः॑॥५४॥

इ॒माः। गिरः॑। आ॒दि॒त्येभ्यः॑। घृ॒तस्नू॒रिति॑ घृ॒त्ऽस्नूः॑। स॒नात्। राज॑भ्य॒ इति॒ राज॑ऽभ्यः। जु॒ह्वा᳖। जु॒हो॒मि॒ ॥ शृ॒णो॒तु॑। मि॒त्रः। अ॒र्य्य॒मा। भगः॑। नः॒। तु॒वि॒जा॒त इति॑ तुविऽजा॒तः। वरु॑णः। दक्षः॑। अꣳशः॑ ॥५४ ॥

Mantra without Swara
इमा गिरऽआदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि । शृणोतु मित्रोऽअर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अँशः ॥

इमाः। गिरः। आदित्येभ्यः। घृतस्नूरिति घृत्ऽस्नूः। सनात्। राजभ्य इति राजऽभ्यः। जुह्वाड्ट। जुहोमि॥ शृणोतु। मित्रः। अर्य्यमा। भगः। नः। तुविजात इति तुविऽजातः। वरुणः। दक्षः। अꣳशः॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में 'कविशस्त मन्त्रों के श्रवण' का वर्णन है। उसी बात को कुछ विस्तार से कहते हैं कि (इमाः गिरः) = इन वाणियों को जो (घृतस्नूः) = ज्ञानदीप्ति का स्रवण करनेवाली हैं, (सनात्) = नित्य (राजभ्यः) = ज्ञानदीप्ति से देदीप्यमान (आदित्येभ्यः) = चारों वेदों का ग्रहण करनेवाले आदित्यसंज्ञक विद्वानों की (जुह्वा) = वाणी से [जुहू इति वाङ्नाम] जुहोमि=आहूत करता हूँ। चारों वेदों के विद्वान् 'आदित्य' हैं। इन आदित्य विद्वानों से मैं सदा ज्ञान की वाणियों को सुनता हूँ। उन वाणियों का उच्चारण करता हुआ उन ज्ञानवाणियों को हृदय में धारण करता हूँ। २. इन ज्ञानवाणियों को सुनने का परिणाम यह हो कि निम्न देव नः शृणोतु हमारी प्रार्थना को सुनें। मैं इन देवों का कृपापात्र बनूँ, इन देवों का मुझमें निवास हो [क] मित्रः = स्नेह की देवता । हम सदा सबके साथ स्नेह करनेवाले बनें। [ख] अर्यमा= [अरीन् गच्छति ] हम काम-क्रोधादि शत्रुओं का नियमन करनेवाले बनें, 'अर्यमेति तमाहुर्यो ददाति ' = हम सदा कुछ देनेवाले हों। [ग] भगः = ऐश्वर्य की देवता । . भज सेवायाम् ' = हम भजनीय धन को प्राप्त करनेवाले बनें। [घ] तुविजात:- महान् विकासवाला वरुणः - द्वेष के निवारणवाला वरुणदेव हमारी प्रार्थना को सुने। हम किसी से द्वेष न करें। द्वेष व ईर्ष्या से ऊपर उठना ही विकास का मार्ग है। [ङ] दक्षः = हम 'दक्ष' के प्रिय बनें। दक्ष [to grow]=अपनी शक्तियों के विकासवाले हों। दक्ष [to act quickly, to go ] = हम स्फूर्ति से कार्यों को करनेवाले हों। दक्ष [ to hurt, to kill ] = रोगकृमियों के ध्वसंक हों। दक्ष [to be competent ] = हम कार्यकुशल बनें। [च] अंश :- उल्लिखित सब बातों को अपने जीवन में लाकर हम प्रभु के 'अंश' छोटे रूप बन पाएँ अथवा 'अंश्' to divide=हम अपने धनों का उचित विभाग करनेवाले हों, सारे का सारा स्वयं न खा जाएँ । वस्तुतः प्रभु बाँटते हैं तो सब बाँट देते हैं, अपने लिए कुछ रखकर जीव भी अधिक-से-अधिक बाँटने का प्रयत्न करे, अपनी आवश्यकताओं को न्यूनतम करने का प्रयत्न करे। यही परमेश्वर का 'छोटा रूप' बनने का उपाय है। ३. इस प्रकार जीवन बनानेवाला व्यक्ति 'कूर्म गार्त्समद ' है । " । 'कूर्म ' = क्रियाशील, गृत्स प्रभु का स्तोता मद-आनन्दमय । वस्तुतः नित्य ज्ञानयज्ञ करता हुआ यह व्यक्ति अपने जीवन को प्रभु के अनुरूप बनाने का प्रयत्न करता है।
Essence
भावार्थ- हम ज्ञानावाणियों को सुनें। स्नेह, दान, सेवनीय धन, द्वेषनिवारण व दक्षता को धारण करें और प्रभु का ही छोटा रूप बनने का प्रयत्न करें।
Subject
प्रभु का छोटा रूप