Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 53

58 Mantra
34/53
Devata- लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- ऋजिष्व ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒त नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यः शृणोत्व॒जऽएक॑पात् पृथि॒वी स॑मु॒द्रः।विश्वे॑ दे॒वाऽऋ॑ता॒वृधो॑ हुवा॒नाः स्तु॒ता मन्त्राः॑ कविश॒स्ताऽअ॑वन्तु॥५३॥

उ॒त। नः॒। अहिः॑। बु॒ध्न्यः᳖। शृ॒णो॒तु॒। अ॒जः। एक॑पा॒दित्येक॑ऽपात्। पृ॒थि॒वी। स॒मु॒द्रः ॥ विश्वे॑। दे॒वाः। ऋ॒ता॒वृधः॑। ऋ॒त॒वृध॒ इत्यृ॑त॒ऽवृधः॑। हु॒वा॒नाः। स्तु॒ताः। मन्त्राः॑। क॒वि॒श॒स्ता इति॑ कविऽश॒स्ताः। अ॒व॒न्तु॒ ॥५३ ॥

Mantra without Swara
उत नोहिर्बुध्न्यः शृणोत्वजऽएकपात्पृथिवी समुद्रः । विश्वे देवाऽऋतावृधो हुवाना स्तुता मन्त्राः कविशस्ताऽअवन्तु ॥

उत। नः। अहिः। बुध्न्यः। शृणोतु। अजः। एकपादित्येकऽपात्। पृथिवी। समुद्रः॥ विश्वे। देवाः। ऋतावृधः। ऋतवृध इत्यृतऽवृधः। हुवानाः। स्तुताः। मन्त्राः। कविशस्ता इति कविऽशस्ताः। अवन्तु॥५३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में हिरण्य के बन्धन से 'आयुष्मान्' उत्तम जीवनवाला होने का उल्लेख था । उसी उत्तम जीवन का चित्रण प्रस्तुत मन्त्र में है। इस मन्त्र का ऋषि 'ऋजिश्वा' है। 'ऋजुना श्वयति'- सरल मार्ग से चलता है और आगे बढ़ता है (श्वि गतिवृद्धयोः), एवं उत्तम जीवन वह है जिसमें [क] सरलता है, [ख] गतिशीलता है और [ग] शक्तियों का वर्धन है, यह 'ऋजिश्वा' प्रार्थना करता है कि (नः) = हमारी प्रार्थना को (अहिर्बुध्न्यः) = अहीन मूलवाला [अग्निर्वा अहिर्बुध्न्यः - कौ० १६।७] अग्नि (उत) = और (अजः एकपात्) = [सूर्यं देवमजमेकपादम् - तै० ३।१।२८] सूर्य, (पृथिवी) = पृथिवी, (समुद्रः) = समुद्र-ये देव (शृणोतु) = सुनें। इन सब देवों की मुझपर कृपा हो। मैं इन देवों की विशेषताओं को अपने जीवन में धारण करनेवाला बनूँ। [क] अग्नि के समान सब मलों का जलानेवाला बनूँ [ख] मलों का नाश होकर यह तेजस्विता के दृष्टिकोण से सूर्य जैसा बनता है। [ग] तेजस्वी होने के कारण यह पृथिवी के समान क्षमाशील होता है। पृथिवी का तो नाम ही 'क्षमा' पड़ गया है। हम उसपर कूदते - फाँदते हैं, गड्ढे करते हैं, परन्तु पृथिवी सब सहती है। यह तेजस्वी पुरुष भी सहनशील बनता है। [घ] यह क्षमाशील पुरुष समुद्र के समान गम्भीर होता है । २. अग्नि को 'अहिर्बुध्न्य' कहा है, अहीन मूलवाला। जब तक शरीर में यह अग्नितत्त्व है तब तक जीवन का मूल क्षीण नहीं होता। अग्नि गई और मूल नष्ट हुआ। सूर्य 'अज एकपात्' है। 'अज गतिक्षेपणयोः ' = सूर्य निरन्तर क्रिया से मलों को दूर फेंक रहा है और एक बार इसने कदम रखा तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया । ३. 'अग्नि, सूर्य, पृथिवी और समुद्र' तो हमारी प्रार्थना को सुनें ही, अन्य सब देव भी (हुवानाः) = परस्पर स्पर्धा करते हुए (ऋतावृधः) = मुझमें ऋत को बढ़ानेवाले हों। सब देव अपनी दिव्यता को मुझमें भरनेवाले हों। मैं सब देवों का ऐसा प्रिय बनूँ कि वे एक-दूसरे से बढ़कर मुझे अच्छा बनाने की कामना करें। मैं सब देवों की दिव्यता का पात्र बन जाऊँ। ४. (स्तुताः) = प्रभु की स्तुति का प्रतिपादन करनेवाले (कविशस्ताः) = क्रान्तदर्शी विद्वानों से उच्चारण किये गये (मन्त्राः) = मन्त्र [ ज्ञान प्रतिपादकवाक्य] (अवन्तु) = हमारी रक्षा करें। हम विद्वानों से सदा प्रभु की महिमा की प्रतिपादिका उत्तम ज्ञानवाणियों को सुनें, जिससे हमारे जीवन सुन्दर और सुन्दरतर बनते जाएँ ।
Essence
भावार्थ- उत्तम जीवन वह है जो [क] सरलता, गतिशीलता व शक्तिवर्धनवाला है[ऋजिश्वा] । [ख] अग्नि के समान मलों का दाहक, सूर्य के समान तेजस्वी, पृथिवी के समान क्षमाशील व समुद्र के समान गम्भीर है। [ग] जिसमें सब दिव्य गुणों ने ऋत व सत्य का वर्धन किया है। [घ] जो विद्वानों से ज्ञानवाणियों को सुनने में व्यतीत होता है।
Subject
आदर्श जीवन