Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 51

58 Mantra
34/51
Devata- हिरण्यन्तेजो देवता Rishi- दक्ष ऋषिः Chhand- भुरिक्छक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न तद्रक्षा॑सि॒ न पि॑शा॒चास्त॑रन्ति दे॒वाना॒मोजः॑ प्रथम॒जꣳ ह्ये॒तत्। यो बि॒भर्ति॑ दाक्षाय॒णꣳ हिर॑ण्य॒ꣳ स दे॒वेषु॑ कृणुते दी॒र्घमायुः॒ स म॑नु॒ष्येषु कृणुते दी॒र्घमायुः॑॥५१॥

न। तत्। रक्षा॑सि। न। पि॒शा॒चाः। त॒र॒न्तिः। दे॒वाना॑म्। ओजः॑। प्र॒थ॒म॒जमिति॑ प्रथम॒ऽजम्। हि। ए॒तत् ॥ यः। बि॒भर्त्ति॑। दा॒क्षा॒य॒णम्। हिर॑ण्यम्। सः। दे॒वेषु॑। कृ॒णु॒ते॒। दी॒र्घम्। आयुः॑। सः। म॒नु॒ष्ये᳖षु। कृ॒णु॒ते॒। दी॒र्घम्। आयुः॑ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
न तद्रक्षाँसि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमजँ ह्येतत् । यो बिभर्ति दाक्षायणँ हिरण्यँ स देवेषु कृणुते दीर्घमायुः स मनुष्येषु कृणुते दीर्घमायुः ॥

न। तत्। रक्षासि। न। पिशाचाः। तरन्तिः। देवानाम्। ओजः। प्रथमजमिति प्रथमऽजम्। हि। एतत्॥ यः। बिभर्त्ति। दाक्षायणम्। हिरण्यम्। सः। देवेषु। कृणुते। दीर्घम्। आयुः। सः। मनुष्येषु। कृणुते। दीर्घम्। आयुः॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गतमन्त्र के 'हिरण्य' का ही परिचय इन शब्दों में देते हैं कि १. (तत्) = इस हिरण्य = वीर्य को न रक्षांसि न तो रक्षस् और (न पिशाचाः) = न ही पिशाच (तरन्ति) = तैर पाते हैं। 'रक्षस्' वे कृमि हैं जो अपने रमण के लिए हमारा क्षय करते हैं। ये कृमि नाना प्रकार के रोगों का कारण बनते हैं और 'पिशितम् अश्नन्ति' जो हमारे मांस को ही खा जाते हैं और हमें निर्बल [Emaciated] कर देते हैं- ये 'पिशाच' कहलाते हैं। शरीर में हिरण्य के होने पर ये रक्षस् व पिशाच हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। वीर्य शब्द का अर्थ ही 'विशेषरूप से कम्पित करके इन्हें दूर भगानेवाला' है, इसीलिए तो यह हिरण्य-हित व रमणीय है । २. (देवनाम् ओजः) = यह देवताओं का ओज है। देवों की वृद्धि का कारण है [ओज् to increase]। असुर इसे भोगों का साधन बना विनष्ट हो जाते हैं। देव इसकी रक्षा करते हैं। (एतत्) = यह (हि) = निश्चय से (प्रथमजम्) = प्रथामाश्रम में, ब्रह्मचर्याश्रम में होनेवाला देवताओं का तेज सचमुच (प्रथमजम्) = [प्रथ विस्थारे] अत्यन्त विस्तृत शक्तियोंवाले पुरुष को जन्म देनेवाला है । ३. (यः) = जो कोई भी इस (दाक्षायणम्) = [to grow ] वृद्धि के कारणभूत [to kill] रोगकृमियों के विध्वंसक (हिरण्यम्) = हितरमणीय वीर्य को बिभर्ति धारण करता है। (सः) = वह (देवषु) = देवों में (दीर्घं आयुः) = दीर्घ जीवन को कृणुते करता है, (सः) = वह मनुष्येषु मनुष्यों में (दीर्घं आयुः) = दीर्घ जीवन (कृणुते) = कर लेता है, अर्थात् इस वीर्य को धारण करनेवाला व्यक्ति देव- दिव्य गुणों का पुञ्ज बनता है और मनुष्य मननशील ज्ञानी बनता है। दिव्य व ज्ञानी बनकर यह दीर्घ जीवनवाला होता है, एवं इस दाक्षायण हिरण्य के तीन लाभ हैं - [क] शरीर में नीरोगता से दीर्घ जीवन, [ख] मन में दिव्यगुण, [ग] मस्तिष्क में अवबोध [मनु अवबोध ] । इसी कारण इसे दाक्षायाण सुनहला आभूषण a golden ornament कहा गया है।
Essence
भावार्थ- हम दाक्षायण हिरण्य को धारण करके दीर्घजीवी, दिव्य व दीप्त ज्ञानवाले बनें।
Subject
हिरण्य का धारण