Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 5

58 Mantra
34/5
Devata- मनो देवता Rishi- शिवसङ्कल्प ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ यजू॑षि॒ यस्मि॒न् प्रति॑ष्ठिता रथना॒भावि॑वा॒राः।यस्मिँ॑श्चि॒त्तꣳ सर्व॒मोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥५॥

यस्मि॑न्। ऋचः॑। साम॑। यजू॑षि। यस्मि॑न्। प्रति॑ष्ठि॑ता। प्रति॑स्थ॒तेति॒ प्रति॑ऽस्थिता। र॒थ॒ना॒भावि॒वेति॑ रथना॒भौऽइ॑व। अ॒राः ॥ यस्मि॑न्। चि॒त्तम्। सर्व॑म्। ओत॒मित्याऽउ॑तम्। प्र॒जाना॒मिति॑ प्र॒ऽजाना॑म्। तत्। मे॒। मनः॑। शि॒वस॑ङ्कल्प॒मिति॑ शि॒वऽस॑ङ्कल्पम्। अ॒स्तु ॥५ ॥

Mantra without Swara
यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतम्प्रजानान्तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥

यस्मिन्। ऋचः। साम। यजूषि। यस्मिन्। प्रतिष्ठिता। प्रतिस्थतेति प्रतिऽस्थिता। रथनाभाविवेति रथनाभौऽइव। अराः॥ यस्मिन्। चित्तम्। सर्वम्। ओतमित्याऽउतम्। प्रजानामिति प्रऽजानाम्। तत्। मे। मनः। शिवसङ्कल्पमिति शिवऽसङ्कल्पम्। अस्तु॥५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (तत् मे मनः) = वह मेरा मन (शिवसंकल्पम्) = शुभ संकल्पवाला (अस्तु) = हो, (यस्मिन्) = जिसमें और (यस्मिन्) = जिससे ही (ऋच:) = सम्पूर्ण विज्ञान [ऋग्वेद - विज्ञानवेद] साम-उपासना व (यजूंषि) = यज्ञात्मक कर्म में (प्रतिष्ठिता:) = प्रतिष्ठित हैं (इव) = जैसे (रथनाभौ) = रथ के पहिये की नाभि में अरा:- अरे प्रतिष्ठित होते हैं। नाभि के हिलते ही सब अरे हिल जाते हैं, इसी प्रकार मानसविकार होते ही सारा विज्ञान, सारी उपासना व सारा कर्मकाण्ड समाप्त हो जाता है। वैज्ञानिकों ने प्रकृति तथ्यों का निरीक्षण पूर्ण मनोयोग से करना होता है। उपासना तो चलती ही तब है जब मन से अन्य सब विषयों को निकाल दिया जाए। सब यज्ञ मन से ही होते है। क्या वेदाधिगम= [वेद पढ़ना] और क्या वैदिक कर्मकाण्ड- ये सब मन के न होने पर नहीं चलते। मनोनिरोध करके मनुष्य वैज्ञानिक तथ्यों का विचार कर पाता है, मनोनिरोध का ही नाम उपासना हो जाता है [ध्यानं निर्विषयं मनः], मन की एकाग्रता से किया गया कर्म सुन्दर होता है। २. यह मन वह है (यस्मिन्) = जिसमें प्रजानाम् प्रजाओं का (सर्वम् चित्तम्) = सारा चित्त, सम्पूर्ण स्मरण (ओतम्) = ओत-प्रोत है, व्याप्त है। जब यह इन्द्रिय द्वारों से बहार जाकर संसार के विषयों के साथ रम जाता है तब मनुष्य को ('कोऽहं कुत आयात:') = मैं कौन हूँ, यहाँ क्यों आया हूँ ? यह सब भूल जाता है। आत्मविस्मरण से बचने करना अत्यन्त आवश्यक है। ('योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः')चित्तवृत्ति- के लिए मन को वश में निरोध ही योग है और ('तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्') = तभी द्रष्टा स्वरूप में स्थित होता है, अपने को पहचानता है, भूलता नहीं।
Essence
भावार्थ - मन ही विज्ञान, उपासना व कर्म का आधार है। आत्मस्मृति का मूल मन ही है। वह एकाग्र रहा तो मनुष्य अपने स्वरूप को देख पाता है।
Subject
ऋग्-यजु-साम का आधार मन