Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 46

58 Mantra
34/46
Devata- लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- विहव्य ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये नः॑ स॒पत्ना॒ऽअप॒ ते भ॑वन्त्विन्द्रा॒ग्निभ्या॒मव॑ बाधामहे॒ तान्।वस॑वो रु॒द्राऽआ॑दि॒त्याऽउ॑परि॒स्पृशं॑ मो॒ग्रं चेत्ता॑रमधिरा॒जम॑क्रन्॥४६॥

ये। नः॒। स॒पत्ना॒ इति॑ स॒ऽपत्नाः॑। अप॑। ते। भ॒व॒न्तु॒। इ॒न्द्रा॒ग्निभ्या॒मिती॑न्द्रा॒ग्निऽभ्या॑म्। अव॑। बा॒धा॒म॒हे॒। तान् ॥ वस॑वः। रु॒द्राः। आ॒दि॒त्याः। उ॒प॒रिस्पृश॒मित्युपरि॒ऽस्पृश॑म्। मा॒। उ॒ग्रम्। चेत्तार॑म्। अ॒धि॒रा॒जमित्य॑धिऽरा॒जम्। अ॒क्र॒न् ॥४६ ॥

Mantra without Swara
ये नः सपत्नाऽअप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान् । वसवो रुद्रा आदित्या उपरिस्पृशम्मोग्रञ्चेत्तारमधिराजमक्रन् ॥

ये। नः। सपत्ना इति सऽपत्नाः। अप। ते। भवन्तु। इन्द्राग्निभ्यामितीन्द्राग्निऽभ्याम्। अव। बाधामहे। तान्॥ वसवः। रुद्राः। आदित्याः। उपरिस्पृशमित्युपरिऽस्पृशम्। मा। उग्रम्। चेत्तारम्। अधिराजमित्यधिऽराजम्। अक्रन्॥४६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'विहव्य' है - विशिष्ट प्रार्थनावाला। इसकी प्रार्थना इस प्रकार है - १. (ये) = जो (नः) = हमारे (सपत्ना:) = 'शत्रु' हैं (ते) = वे (अपभवन्तु) = दूर हों। शरीर का पति वस्तुतः मैं हूँ, यह मुझे जीवन यात्रा को पूर्ण करने के लिए दिया गया है, परन्तु रोगकृमि इसमें घर कर लेते हैं और वे इसका पति बनना चाहते हैं, अतः वे मेरे 'सपत्न' कहलाते हैं। इसी प्रकार ईर्ष्या-द्वेष के अशुभ विचार मेरे मस्तिष्क के पति बनने का प्रयत्न करते हैं, अतः वे भी मेरे 'सपत्न' हैं। इन सबको दूर करने के लिए यह 'विहव्य' प्रार्थना करता है। इसका प्रयत्न यही होता है कि यह नीरोग व निद्वेष बना रहे। २. (तान्) = उन रोगों व ईर्ष्या-द्वेष के विचारों को (इन्द्राग्निभ्याम्) = इन्द्र व अग्नि से (अवबाधमहे) = दूर ही रोक देते हैं, उन्हें अपने पास नहीं फटकने देते। द्युलोक की देवता 'इन्द्र' है और पृथिवीलोक की प्रमुख देवता 'अग्नि' है। जैसे द्युलोक में इन्द्र-सूर्य चमकता है उसी प्रकार हमारे मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान का सूर्य चमके और शरीर में अग्नि हो, शक्ति की उष्णता हो। जब यह शक्ति की उष्णता नहीं रह जाती तब मनुष्य ठण्डा पड़ जाता है, अर्थात् मृत हो जाता है। शरीर की शक्ति और मस्तिष्क का ज्ञान दोनों मिलकर हमसे रोगों व मलिन विचारों को दूर रखते हैं । ३. (वसवः रुद्राः आदित्याः) = वसु, रुद्र व आदित्य, अर्थात् सब देवता (मा) = मुझे (उपरिस्पृशम्) = उपरले-और-उपरले लोक का स्पर्श करनेवाला, अर्थात् उत्कर्ष की ओर चलनेवाला (उग्रम्) = उदात्त, कमीनेपन व छोटे दिल से ऊपर उठा हुआ (चेत्तारम्) = संज्ञानवाला [चिती संज्ञाने ] तथा (अधिराजम्) = सब इन्द्रियों का अधिष्ठाता अक्रन्-बनाते हैं। २.
Essence
भावार्थ - विहव्य की प्रार्थना तीन भागों में बँटी हुई है। १. हमारे सपत्न दूर हों, ज्ञान व शक्ति से हम सब सपत्नों को दूर रखने में समर्थ हों, ३. देवों की कृपा से हम उत्कर्ष की ओर चलनेवाले, उदात्त, आत्मस्मृतिमान् चेतन, व अधिराट् इन्द्रियों के अधिष्ठाता बन पाएँ।
Subject
विहव्य की विशिष्ट प्रार्थना