Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 44

58 Mantra
34/44
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तद्विप्रा॑सो विप॒न्यवो॑ जागृ॒वासः॒ समि॑न्धते।विष्णो॒र्यत्प॑र॒मं प॒दम्॥४४॥

तत्। विप्रा॑सः। वि॒प॒न्यवः॑। जा॒गृ॒वास॒ इति॑ जागृ॒वासः॑। सम्। इ॒न्ध॒ते॒ ॥ विष्णोः॑। यत्। प॒र॒मम्। प॒दम् ॥४४ ॥

Mantra without Swara
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवाँसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमम्पदम् ॥

तत्। विप्रासः। विपन्यवः। जागृवास इति जागृवासः। सम्। इन्धते॥ विष्णोः। यत्। परमम्। पदम्॥४४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
व्यापक उन्नति करनेवाला जीव भी विष्णु है, परन्तु सदा से पूर्णोन्नत प्रभु ही वस्तुत: विष्णु हैं, उस विष्णु की उपासना जीव विष्णु बनकर ही करता है 'विष्णुर्भूत्वा भजेद् विष्णुम् '। उस महान् (विष्णोः) = विष्णु का (यत्) = जो (परमम् पदम्) = उत्कृष्ट स्थान है (तत्) = उसे (समिन्धते) = अपने अन्दर दीप्त करते हैं। कौन ? १. (विप्रासः) = [वि+प्रा] अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले । आत्मालोचन के द्वारा जहाँ भी कमी दिखी, उसे उन्होंने दूर करने का प्रयास किया। शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग को ये इसी प्रकार स्वस्थ रख पाते हैं। २. (विपन्यवः) = [पण् स्तुतौ] विशिष्ट स्तुतिवाले। ये अपने मन को सदा प्रभु के स्तवन में लगाते हैं, इसी कारण मन में मलिनता उत्पन्न नहीं होती। प्रभु-प्रवण मन सदा पवित्र बना रहता है। प्रभु स्तुति में न लगा हुआ मन विषयों में चला जाता है और शत्रु बन जाता है। ३. (जागृवांसः) = जो सदा जागते हैं। जिनका बुद्धिरूप सारथि सदा सचेत है। मन को विषय जाल में फँसने से बचाने के लिए ये (विपन्यवः) = विशिष्टरूप से प्रभु का स्तवन करनेवाले बनते हैं, इस शरीर रथ की सारथिभूत बुद्धि को सदा जागरित रखते हैं। बुद्धिपूर्वक चलनेवाले ये सचमुच 'मेधातिथि' [मेधया अतति] होते हैं। इस मेधातिथि के ये ही तीन विक्रम हैं 'विप्र, विपन्यु व जागृवान्' बनना।
Essence
भावार्थ- 'विप्र, विपन्यु व जागृवान्' बनकर हम विष्णु के परमपद को प्राप्त करें।
Subject
विप्र, विपन्यु व जागृवान्