Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 41

58 Mantra
34/41
Devata- पूजा देवता Rishi- सुहोत्र ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पूष॒न्तव॑ व्र॒ते व॒यं न रि॑ष्येम॒ कदा॑ च॒न।स्तो॒तार॑स्तऽइ॒ह स्म॑सि॥४१॥

पूष॑न्। तव॑। व्र॒ते व॒यम्। न। रि॒ष्ये॒म॒। कदा॑। च॒न ॥ स्तो॒तारः॑। ते॒। इ॒ह। स्म॒सि॒ ॥४१ ॥

Mantra without Swara
पूषन्तव व्रते वयन्न रिष्येम कदा चन । स्तोतारस्तऽइह स्मसि ॥

पूषन्। तव। व्रते वयम्। न। रिष्येम। कदा। चन॥ स्तोतारः। ते। इह। स्मसि॥४१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
'सुहोत्र' ऋषि का यह मन्त्र है। [हु=आदान] यह (सु) = उत्तम वस्तुओं का (होत्र) = आदान करता हुआ अपना त्राण करता है। यह कहता है कि हे (पूषन्) = सबका पोषण करनेवाले सूर्यदेव ! (वयम्) = हम तव व्रते तेरे व्रत में चलते हुए (कदाचन) = कभी भी (न रिष्येम) = हिंसित न हों। इसी उद्देश्य से इह इस मानव जीवन में हम (ते) = तेरे (स्तोतार:) = स्तुति करनेवाले (स्मसि) = होते हैं। स्तुति का अभिप्राय यही है कि हम तेरे गुणों का स्मरण करते हुए अपने जीवन के लिए भी एक लक्ष्यदृष्टि स्थिर करते हैं। १. जैसे सूर्य 'पूषा' है, सबका पोषण करनेवाला है, इस प्रकार हम भी 'पोषण' का व्रत लेते हैं। हम धारणात्मक कर्म ही करेंगे. ध्वंसात्मक नहीं। वस्तुतः यही तो 'दधिक्रावा' [संख्या ३९] बनना है। २. यह पूषा आदित्य' है सभी स्थानों से जल का आदान करता है, परन्तु इस ग्रहण में यह जल को ही लेता है, उस स्थान की दुर्गन्ध व मलिनता को नहीं लेता। हमारा भी यह व्रत हो कि हम औरों की अच्छाई को ही देखें और उसी को लें। ३. सूर्य [सरति] निरन्तर चल रहा है। यह आराम के लिए कभी कहीं रुक नहीं जाता। ४. सूर्य की चौथी बात यह है कि यह लोगों की स्तुति - निन्दा से अपने तापन व प्रकाशनरूप कार्य से कभी विचलित नहीं होता। हमें भी अपना आदर्श यही रखना है कि ('निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । अद्यैव मरणामस्तु युगान्तरे वा, न्यायात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ।') स्तुति, निन्दा, ऐश्वर्य व निर्धनता तथा जीवन व मरण हमें अपने कर्त्तव्य पथ से विचलित न कर सकेंगे। प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'सुहोत्र' इन 'पोषण, उत्तमता का आदान, सतत क्रियाशीलता व कर्तव्यपथ से अविचलता' रूप उत्तम बातों का आदान करता हुआ सूर्य के व्रत में चलता है, सूर्य का सच्चा स्तोता बनता है और इस प्रकार अपने जीवन में हिंसित नहीं होता।
Essence
भावार्थ- हम सूर्य से शिक्षा ग्रहण करके अपने जीवन में [क] धारणात्मक कर्म ही करें, [ख] सब जगह से अच्छाई को लेनेवाले हों, [ग] क्रियाशील रहें, [घ] स्तुति - निन्दा हमें कर्त्तव्यपथ से विचलित न कर सकें।
Subject
पूजा के मार्ग पर