Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 28

58 Mantra
34/28
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- प्रस्कण्व ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒भा पि॑बतमश्विनो॒भा नः॒ शर्म॑ यच्छतम्।अ॒वि॒द्रि॒याभि॑रू॒तिभिः॑॥२८॥

उ॒भा। पि॒ब॒त॒म्। अ॒श्वि॒ना॒। उ॒भा। नः॒। शर्म॑। य॒च्छ॒त॒म् ॥ अ॒वि॒द्रि॒याभिः॑। ऊ॒तिभि॒रित्यू॒तिऽभिः॑ ॥२८ ॥

Mantra without Swara
उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः ॥

उभा। पिबतम्। अश्विना। उभा। नः। शर्म। यच्छतम्॥ अविद्रियाभिः। ऊतिभिरित्यूतिऽभिः॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले चार मन्त्रों में सविता की आराधना थी। सविता की अराधना का अभिप्राय इतना ही है कि इस समय मुख्यरूप से प्राणसाधना होनी चाहिए। उस प्राणसाधना का ही प्रस्तुत तीन मन्त्रों में उल्लेख है और इसके बाद फिर ३१ वें मन्त्र में हिरण्यस्तूप ऋषि सविता का स्तवन करेंगे। इन मन्त्रों में प्राणसाधना के द्वारा कण-कण करके अभद्रता को दूर करके भद्र वस्तुओं को अपने अन्दर भरनेवाला 'प्रस्कण्व' कहलाता है। यह प्रस्कण्व ही मेधावी = समझदार है। प्राणसाधना को जीवन का मूलाधार समझना चाहिए। २. प्रस्कण्व कहता है- हे (उभा अश्विना) = दोनों प्राणापानो! (पिबतम्) = तुम सोम का पान करो। वस्तुतः प्राणसाधना का सर्वप्रथम लाभ यही है कि शरीर में उत्पन्न सोमशक्ति शरीर में ही व्याप्त हो जाती है। इसी शक्ति ने शरीर को रोगों के आक्रमण से बचाना है। इस शक्ति के होने पर मन ईर्ष्या-द्वेष आदि से बचा रहता है, इसी शक्ति ने ही बुद्धि की कुण्ठा को दूर करना है । ३. इस प्रकार सोमपान के द्वारा हे प्राणापानो! आप (उभा) = दोनों (नः) = हमें (शर्म) = कल्याण व सुख (यच्छतम्) = दीजिए। वास्तविक सुख 'शरीर, मन व बुद्धि के स्वास्थ्य' में ही है। ४. हे प्राणापानो! (अविद्रियाभिः) = [द्रा-निन्दित] अनिन्दित, प्रशस्त अथवा [दृ-विच्छेद] अविच्छिन्न (ऊतिभिः) = गतियों, क्रियाओं के द्वारा आप हमें सुखी कीजिए । प्राणसाधना के ठीक चलने पर सोमरक्षा द्वारा हमारा मन अशुभ विचारोंवाला होगा ही नहीं और परिणामतः हमारी क्रियाएँ भी उत्तम होंगी। शरीर के स्वास्थ्य के कारण 'आलस्य' न होगा, मन के स्वास्थ्य के कारण 'अशोभा' नहीं होगी और बुद्धि के स्वास्थ्य के कारण उन कर्मों में ' औचित्य ' होगा। इस प्रकार ये प्राणापान हमारे जीवनों को कल्याणमय कर रहे होंगे।
Essence
भावार्थ- प्राणसाधना से शरीर में वीर्य की रक्षा होकर सब कार्य पवित्र होते हैं।
Subject
आश्विनों का सोमपान