Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 27

58 Mantra
34/27
Devata- सविता देवता Rishi- आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये ते॒ पन्थाः॑ सवितः पू॒र्व्यासो॑ऽरे॒णवः॒ सुकृ॑ताऽअ॒न्तरि॑क्षे।तेभि॑र्नोऽअ॒द्य प॒थिभिः॑ सु॒गेभी॒ रक्षा॑ च नो॒ऽअधि॑ च ब्रूहि देव॥२७॥

ये। ते॒। पन्थाः॑। स॒वि॒त॒रिति॑ सवितः। पू॒र्व्यासः॑। अ॒रे॒णवः॑। सुकृ॑ता॒ इति॒॑ सुऽकृ॑ताः। अ॒न्तरि॑क्षे ॥ तेभिः। नः॒। अ॒द्य। प॒थिभि॒रति॑ प॒थिऽभिः॑। सु॒गेभि॒रिति॑ सु॒ऽगेभिः। रक्षा॑। च॒। नः॒। अधि॑। च॒। ब्रू॒हि॒। दे॒व॒ ॥२७ ॥

Mantra without Swara
ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासो रेणवः सुकृताऽअन्तरिक्षे । तेभिर्नाऽअद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नोऽअधि च ब्रूहि देव ॥

ये। ते। पन्थाः। सवितरिति सवितः। पूर्व्यासः। अरेणवः। सुकृता इति सुऽकृताः। अन्तरिक्षे॥ तेभिः। नः। अद्य। पथिभिरति पथिऽभिः। सुगेभिरिति सुऽगेभिः। रक्षा। च। नः। अधि। च। ब्रूहि। देव॥२७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सवितः) = सबको कर्मों में प्रेरित करनेवाले सूर्यदेव ! (ये) = जो (ते) = तेरे (पन्थाः) = मार्ग (अन्तरिक्षे) = इस विशाल आकाश में (सुकृताः) = उतम प्रकार से बनाये गये हैं जो (पूर्व्यासः) = हमारी सब आवश्यकताओं का पूरण करनेवाले हैं और (अरेणवः) = धूलिरहित हैं (तेभिः) = उन (सुगेभिः) = सुगमता से गति के योग्य (पथिभिः) = मार्गों से (नः) = हमें (अद्य) = आज (रक्ष) = सुरक्षित कीजिए, (च) = और हे (देव) = दिव्य प्रकाश देनेवाले सूर्य ! (नः) = हमें (अधिब्रूहि) = खूब उपदेश दीजिए। 'हमारे जीवन का मार्ग क्या हो?' यह हम आपसे जान सकें। 'रास्ते कैसे हों ?' इस प्रश्न का उतर यह है कि १. (पूर्व्यासः) = पूरण करनेवाले, आवश्यतओं को पूरा करनेवाले हों। जैसे पैदल के चलने का मार्ग, गाड़ियों का मार्ग ये सब अलग-अलग हों। २. (अरेणवः) = उन मार्गों पर धूल न हो। धूलवाले मार्ग फेफड़ों की बीमारियों के कारण बनेंगे? ३. (सुकृताः) = ये मार्ग अच्छे प्रकार बने हुए हों ठोकरें न लगती रहें। ४. मार्ग ऊबड़-खाबड़ न होकर ('सु-ग') = हों। मनुष्य प्रतिदिन उदय होते हुए सूर्य से उपदेश ग्रहण करे। १. जैसे सूर्य बड़े नियम से उदय होता है उसी प्रकार मनुष्य नियमित जीवनवाला हो, उसका जीवन clock-wise नहीं sun-wise चले (‘स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव') । २. सूर्य सभी को प्रकाश देता है, सूर्य के व्यवहार में पक्षपात नहीं। मनुष्य भी सबमें समभाव रक्खे। ३. सूर्य निर्लेपभाव से अपना कार्य करता चलता है, किसी की स्तुति - निन्दा से वह अपमानित नहीं होता । मनुष्य को भी चाहिए कि अपने कर्त्तव्यकर्म को करता चले, अकर्त्तव्य को कभी न करे। इस प्रकार सूर्य से उपदेश लेकर कोई कभी हिंसित नहीं होता। सूर्य का सर्वमहान् उपदेश यह इस रूप में लेता है कि जैसे सूर्य पानी की ऊर्ध्वगति का कारण बनता है, उसी प्रकार यह अपने शरीर में वीर्य (हिरण्य) की ऊर्ध्वगति करनेवाला 'हिरण्य- स्तूप' हो जाता है। वीर्य की ऊर्ध्वगति के कारण ही यह शक्तिशाली अङ्गोंवाला 'आङ्गिरस' बन जाता है।
Essence
भावार्थ- सूर्य से हम अपने जीवन के मार्ग का निश्चय करें। नियमित, निष्पक्ष, निर्लेप जीवनवाले हों और वीर्य की ऊर्ध्वगति का पूर्ण ध्यान करें।
Subject
मार्ग कैसे हों ? सविता का उपदेश