Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 26

58 Mantra
34/26
Devata- सविता देवता Rishi- आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यहस्तो॒ऽअसु॑रः सुनी॒थः सु॑मृडी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ्।अ॒प॒सेध॑न् र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द् दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः॥२६॥

हिर॑ण्यहस्त॒ इति॒ हिर॑ण्यऽहस्तः। असु॑रः। सु॒नी॒थ इति॑ सुऽनी॒थः। सु॒मृ॒डी॒क इति॑ सुमृडी॒कः। स्ववा॒निति॒ स्वऽवा॑न्। या॒तु॒। अ॒र्वाङ् ॥ अ॒प॒सेध॒न्नित्य॑प॒ऽसेध॑न्। र॒क्षसः॑। या॒तु॒धाना॒निति॑ यातु॒ऽधाना॑न्। अस्था॑त्। दे॒वः। प्र॒ति॒दो॒षमिति॑ प्रतिऽदो॒षम्। गृ॒णा॒नः ॥२६ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यहस्तोऽअसुरः सुनीथः सुमृडीकः स्ववा यात्वर्वाङ् । अपसेधन्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषङ्गृणानः ॥

हिरण्यहस्त इति हिरण्यऽहस्तः। असुरः। सुनीथ इति सुऽनीथः। सुमृडीक इति सुमृडीकः। स्ववानिति स्वऽवान्। यातु। अर्वाङ्॥ अपसेधन्नित्यपऽसेधन्। रक्षसः। यातुधानानिति यातुऽधानान्। अस्थात्। देवः। प्रतिदोषमिति प्रतिऽदोषम्। गृणानः॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (हिरण्यहस्तः) = सुवर्णमय हाथवाला । यही भावना पिछले मन्त्र में 'हिरण्यपाणिः' शब्द से व्यक्त हुई है। पाणि शब्द में रक्षा करने की भावना थी तो हस्त शब्द में [हस्तो हन्तेः] नष्ट करने का भाव है। सूर्य अपनी किरणों में विद्यमान स्वर्ण के प्रभाव से हमारे शरीरों की रक्षा करता है और रोगों का नाश करता है। २. (असुरः) = [असून् राति] यह प्राणशक्ति देनेवाला है। प्रश्नोपनिषद् में कहा है कि ('प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य:') = यह सूर्य क्या उदय होता है, प्रजाओं का प्राण ही उदय होता है । ३. (सुनीथः) = सर्वत्र प्रकाश फैलाने के कारण उत्तम मार्गों से ले चलता है। ४. (सुमृडीक:) = उत्तम मार्ग से ले चलकर हमारे जीवनों को उत्तम सुख प्राप्त कराता है। ५. (स्ववान्) = यह उत्तम धनवाला है। स्वास्थ्य ही सर्वोत्तम धन है और उसे प्राप्त कराने में यह सूर्य सर्वमहान् सहायक है। ६. यह सूर्य (यातुधानान्) = शरीर में शतशः पीड़ाओं का आधान करनेवाले (रक्षसः) अपने रमण के लिए औरों का क्षय करनेवाले रोगकृमिरूप राक्षसों को (अपसेधन्) = दूर करता हुआ (अर्वाङ् यातु) = हमें अभिमुखता से प्राप्त हो। हम सूर्याभिमुख होंगे तो रोगकृमियों का संहार होकर हमें स्वास्थ्यरूपी धन की प्राप्ति होगी । ७. उल्लिखित कारणों से ही 'हिरण्यहस्त, असुर, सुनीथ, सुमृडीक व स्ववान्' होने से ही यह (देवः) = दिव्य गुणोंवाला प्रकाशमय सूर्य (प्रतिदोषम्) = प्रतिरात्रि, अर्थात् सदा (गृणान:) = स्तुति किया जाता हुआ (अस्थात्) = ठहरता है, अर्थात् सूर्य के महत्त्व को समझनेवाले लोग सदा सूर्य का स्तवन करते हैं। उसके गुणों का प्रतिदिन स्मरण करते हैं।
Essence
भावार्थ - रोगकृमियों के संहार के लिए प्रात:सायं सूर्याभिमुख होकर ध्यान करना अत्यन्त उपयोगी है।
Subject
स्वास्थ्यरूप धन की प्राप्ति