Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 23

58 Mantra
34/23
Devata- सोमो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वेन॑ नो॒ मन॑सा देव सोम रा॒यो भा॒गꣳ स॑हसावन्न॒भि यु॑ध्य।मा त्वा त॑न॒दीशि॑षे वी॒र्य्यस्यो॒भये॑भ्यः॒ प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टौ॥२३॥

दे॒वेन॑। नः॒। मन॑सा। दे॒व॒। सो॒म॒। रा॒यः। भा॒गम्। स॒ह॒सा॒व॒न्निति॑ सहसाऽवन्। अ॒भि। यु॒ध्य॒ ॥ मा। त्वा॒। आ। त॒न॒त्। ईशि॑षे। वी॒र्य्य᳖स्य। उ॒भये॑भ्यः। प्र। चि॒कि॒त्स॒। गवि॑ष्टा॒विति॒ गोऽइ॑ष्टौ ॥२३ ॥

Mantra without Swara
देवेन नो मनसा देव सोम रायो भागँ सहसावन्नभियुध्य । मा त्वा तनदीशिषे वीर्यस्योभयेभ्यः प्र चिकित्सा गविष्टौ ॥

देवेन। नः। मनसा। देव। सोम। रायः। भागम्। सहसावन्निति सहसाऽवन्। अभि। युध्य॥ मा। त्वा। आ। तनत्। ईशिषे। वीर्य्यस्य। उभयेभ्यः। प्र। चिकित्स। गविष्टाविति गोऽइष्टौ॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र में घर के बड़े व्यक्ति, जो घर के सञ्चालन के लिए धनार्जन के कार्य में लगे हैं, प्रार्थना करते हैं कि हे (देव) = दिव्य गुणों के पुञ्ज ! (सोम) = अत्यन्त शान्त प्रभो ! (सहसावन्) = हे शक्तिशाली प्रभो ! (नः) = हमें (देवेन मनसा) = दिव्य गुणों से युक्त मन के साथ (रायः भागम्) = धन के सेवनीय अंश को (अभियुध्य) = सब ओर से प्राप्त कराइए। इस प्रार्थना प्रभु को जिन नामों से सम्बोधन किया है वे नाम स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि हम अपने धनार्जनादि लौकिक कार्यों में [देव] दिव्य बने रहें, अच्छे गुणों को तिलाञ्जलि न दे दें। हम धन को देवोचित मार्गों से ही कमाएँ, [सोम] इन कार्यों में कभी मानस शान्ति को न खो बैठें। [सह स्तवन] धन को अपने बल व पुरुषार्थ से ही कमानेवाले बनें। धनादि के व्यवहारों में चलते समय हमारा मन 'देव-मन' बना रहे। ये धनादि का अर्जन करनेवाला व्यक्ति हे प्रभो ! (त्वा) = आपको (मा तनत्) = मत पतला कर दे [तन् = to make thin], अर्थात् आपके स्मरण को ढीला न कर दे। यह अपना प्रत्येक दिन आपके स्मरण से ही प्रारम्भ करे और आपके स्मरण के साथ ही समाप्त करे, क्योंकि (वीर्यस्य ईशिषे) = सब शक्ति के ईश तो आप ही हैं। आपके सम्पर्क से ही इसे शक्ति मिलनी है। हे प्रभो! ये व्यक्ति जो दिन में दिव्य मनों के साथ धनादि के अर्जन में लगे रहते हैं और प्रातः सायं आपके साथ अपना सम्पर्क स्थापित करने में यत्नशील होते हैं और इस प्रकार अभ्युदय व निःश्रेयस - इहलोक व परलोक दोनों का ही ध्यान करते हैं। इन (उभयेभ्यः) = लोक-परलोक का ध्यान करनेवालों के लिए (गविष्टौ) [गो इष्टि, गाव: इन्द्रियाणि] = इन्द्रियों से चल रहे इस जीवन-यज्ञ में प्रचिकित्सा - आनेवाले रोगादि विघ्नों का प्रकर्षेण निवारण कीजिए। विघ्नों व न्यूनताओं के दूर होने से इन्द्रियाँ अधिक प्रशस्त हो उठती हैं और यह प्रशस्तेन्द्रिय पुरुष सचमुच 'गो-तम' इस नामवाला होता है।
Essence
भावार्थ- हम मन को पवित्र रखते हुए सुपथ से धनादि का अर्जन करें और प्रभु स्मरण की भावना को ढीला न होने दें।
Subject
इहलोक व परलोक का साधक-'उभय'