Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 22

58 Mantra
34/22
Devata- सोमो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वमि॒माऽओष॑धीः सोम॒ विश्वा॒स्त्वम॒पोऽअ॑जनय॒स्त्वं गाः।त्वमा त॑तन्थो॒र्वन्तरि॑क्षं॒ त्वं ज्योति॑षा॒ वि तमो॑ ववर्थ॥२२॥

त्वम्। इ॒माः। ओष॑धीः। सो॒म॒। विश्वाः॑। त्वम्। अ॒पः। अ॒ज॒न॒यः॒। त्वम्। गाः ॥ त्वम्। आ। त॒त॒न्थ॒। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम्। त्वम्। ज्योति॑षा। वि। तमः॑। ववर्थ॒ ॥२२ ॥

Mantra without Swara
त्वमिमाऽओषधीः सोम विश्वास्त्वमपोऽअजनयस्त्वङ्गाः । त्वमाततन्थोर्वन्तरिक्षन्त्वञ्ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ॥

त्वम्। इमाः। ओषधीः। सोम। विश्वाः। त्वम्। अपः। अजनयः। त्वम्। गाः॥ त्वम्। आ। ततन्थ। उरु। अन्तरिक्षम्। त्वम्। ज्योतिषा। वि। तमः। ववर्थ॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभुभक्त माता-पिता सन्तानों को भी प्रभु भजन में सम्मिलित करते हैं और उनसे प्रतिक्षण प्रयुक्त होनेवाले फूल-फल के विषय में पानी व गौ आदि पशुओं के विषय में प्रश्न करते हैं कि 'इन्हें बनानेवाला कौन है?' वे धीमे-धीमे उन बालकों का ध्यान प्रभु की ओर लाने का प्रयत्न करते हैं, फिर निम्न शब्दों में बालकों का प्रभु-भजन चलता है। हे (सोम) = शान्त प्रभो! जिन आपकी क्रिया अत्यधिक व महान् होती हुई भी बड़ी शान्ति से चल रही है, ऐसे (त्वम्) = आप ही (इमाः विश्वाः ओषधी:) = इन सब ओषधियों को (अजनयः) = उत्पन्न करते हैं, (त्वम्) = आप ही (अप:) = इन [शान्त - निर्मल] जलों को उत्पन्न करते हैं। (त्वम्) = आपने ही हमारे दूध आदि पदार्थों के लिए (गाः) = गौ आदि पशुओं को बनाया है। ठीक बात तो यह है कि (त्वम्) = आपने ही इस विशाल (अन्तरिक्षम्) = आकाश को आततन्थ चारों ओर अनन्त-सी दूरी तक विस्तृत किया है और (त्वम्) = आप ही (ज्योतिषा) = इन सूर्य, चन्द्र व तारों आदि के प्रकाश से (तमः) = अन्धकार को (विववर्थ) = दूर करते हैं। समझदार माता- पिता प्रश्नोत्तर के द्वारा अपने सन्तानों के मस्तिष्क में उल्लिखित बातों को अंकित करते हैं - वे फूल-फल, नदियों, पर्वतों के दृश्यों से प्रभावित सन्तानों को उनके निर्माता के विषय में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं और जब सन्तानें प्रभु का कुछ आभास देखने लगती हैं तब उल्लिखित स्वाभाविक स्तवन उनके मुख से उच्चारित होता है। जिन घरों में इस प्रकार प्रभु-भजन चलेगा वहाँ सन्तान सद्गुणी, पिछले मन्त्र में वर्णित विशेषताओंवाले क्यों न बनेंगे?
Essence
भावार्थ- माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपनी सन्तानों में भी प्रभु भक्ति की प्रवृत्ति उत्पन्न करें।
Subject
बाल- प्रभु-भजन