Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 21

58 Mantra
34/21
Devata- सोमो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सोमो॑ धे॒नुꣳ सोमो॒ऽअर्व॑न्तमा॒शुꣳ सोमो॑ वी॒रं क॑र्म॒ण्यं ददाति।सा॒द॒न्यं विद॒थ्यꣳ स॒भेयं॑ पितृ॒श्रव॑णं॒ यो ददा॑शदस्मै॥२१॥

सोमः॑। धे॒नुम्। सोमः॑। अर्व॑न्तम्। आ॒शुम्। सोमः॑। वी॒रम्। क॒र्म॒ण्य᳖म्। ददा॑ति ॥ सा॒द॒न्य᳖म्। स॒द॒न्य᳖मिति॑ सद॒न्य᳖म्। वि॒द॒थ्य᳖म्। स॒भेय॑म्। पि॒तृ॒श्रव॑ण॒मिति॑ पितृ॒ऽश्रव॑णम्। यः। ददा॑शत्। अ॒स्मै॒ ॥२१ ॥

Mantra without Swara
सोमो धेनुँ सोमोऽअर्वन्तमाशुँ सोमो वीरङ्कर्मण्यन्ददाति । सादन्यँविदथ्यँ सभेयम्पितृश्रवणँयो ददाशदस्मै ॥

सोमः। धेनुम्। सोमः। अर्वन्तम्। आशुम्। सोमः। वीरम्। कर्मण्यम्। ददाति॥ सादन्यम्। सदन्यमिति सदन्यम्। विदथ्यम्। सभेयम्। पितृश्रवणमिति पितृऽश्रवणम्। यः। ददाशत्। अस्मै॥२१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में वर्णित उत्कृष्ट जीवनवाले व्यक्तियों का निर्माण घरों में ही होगा। घरों में प्रत्येक गृहस्थ अपने सन्तान को उत्तम बनाए। वस्तुतः 'माता-पिता की प्रवृत्ति प्रभु - प्रवण होगी, वे प्रकृति में फँसे हुए न होंगे' तभी वे सन्तानों को अच्छा बना पाएँगे। प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि सोम: - वे सोम प्रभु उन माता-पिता को उत्तम सन्तान प्राप्त कराते हैं यः = जो अस्मै इनके लिए ददाशत्-अपना समर्पण करते हैं, अर्थात् अन्तःस्थित उस प्रभु के निर्देशों के अनुसार जीवनयापन करने पर प्रभु हमारे सन्तानों को बड़ा अच्छा बना देते हैं। (सोमः) = वे सोम सन्तान (ददाति) = देते हैं। कैसे सन्तान को ? १. (धेनुम्) = [धेट् पाने] अपने अन्दर उत्पन्न हुई हुई सोम-[वीर्य]-शक्ति का पान करनेवाले को। यह सोमशक्ति का पान आगे आनेवाली सारी उन्नतियों का मूल है, अतः सर्वप्रथम इसी का उल्लेख है । २. (अर्वन्तम्) = [अर्व हिंसायाम्] सोमरक्षा के द्वारा शरीर में सब रोगकृमियों को तथा मन में सब ईर्ष्या-द्वेष आदि की भावनाओं की हिंसा करनेवाले को । सुरक्षित सोम ही वह मन्त्र-तन्त्र - यन्त्र है जो सब रोगों को दूर करता है। सोमी पुरुष ईर्ष्या-द्वेषादि से ऊपर उठा रहता है । ३. (आशुम्) = [अश् व्याप्तौ] शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाले को । इसका जीवन स्फूर्तिमय होता है। आलस्य इसे कभी नहीं घेरता । ४. वे (सोमः) = सोम (वीरम्) = वीर सन्तान को (ददाति) = देते हैं। संसार में यह कभी कायर नहीं बनता । संसार-संघर्ष में घबरा नहीं जाता। आनेवाले विघ्नों का वीरता से मुकाबला करता है। ५. कर्मण्यम् उत्तम कर्मवाले को । प्रभु - प्रवण पति-पत्नी की सन्तान सदा क्रियाशील होती है। ६. (सादन्यम्) = यह सदन = घर का उत्तम निर्माण करनेवाला होता है। ७. (विदथ्यम्) = यह सन्तान ज्ञानयज्ञों में शोभावाला होता है । ८. (सभेयम्) = सभा में सभ्योचित व्यवहारवाला होता है, और ९. (पितृश्रवणम्) = माता-पिता की आज्ञा सुननेवाला होता है, उनका आज्ञाकारी बनता है। पूर्ण यहाँ मन्त्र में प्रभु का 'सोम' नाम से स्मरण किया है। इसका अर्थ [स उमा] = ज्ञानवाला, शान्त व शक्ति का पुञ्ज है। वस्तुतः सन्तान में यही गुण इष्ट हैं कि वे ज्ञानी हों, शान्त हों, सशक्त हों।
Essence
भावार्थ- गृहस्थ प्रभुभक्त होंगे तो उत्तम सन्तान का निर्माण कर पाएँगे।
Subject
उत्तम सन्तान