Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 18

58 Mantra
34/18
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- देवश्रवा देववातश्च भारतावृषी Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒च्छन्ति॑ त्वा सो॒म्यासः॒ सखा॑यः सु॒न्वन्ति॒ सोमं॒ दध॑ति॒ प्रया॑सि।तिति॑क्षन्तेऽअ॒भिश॑स्तिं॒ जना॑ना॒मिन्द्र॒ त्वदा कश्च॒न हि प्र॑के॒तः॥१८॥

इ॒च्छन्ति॑। त्वा॒। सो॒म्यासः॑। सखा॑यः। सु॒न्वन्ति॑। सोम॑म्। दध॑ति। प्रया॑सि ॥ तिति॑क्षन्ते॑। अ॒भिश॑स्ति॒मित्य॒भिऽश॑स्तिम्। जना॑नाम्। इन्द्र॑। त्वत्। आ। कः। च॒न। हि। प्र॒के॒त इति॑ प्रऽके॒तः ॥१८ ॥

Mantra without Swara
इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः सुन्वन्ति सोमन्दधति प्रयाँसि । तितिक्षन्तेऽअभिशस्तिञ्जनानामिन्द्र त्वदा कश्चन हि प्रकेतः ॥

इच्छन्ति। त्वा। सोम्यासः। सखायः। सुन्वन्ति। सोमम्। दधति। प्रयासि॥ तितिक्षन्ते। अभिशस्तिमित्यभिऽशस्तिम्। जनानाम्। इन्द्र। त्वत्। आ। कः। चन। हि। प्रकेत इति प्रऽकेतः॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो ! (त्वा) = आपको (इच्छन्ति) = चाहते हैं, कौन ? जो १. (सोम्यासः) = विनीत, निरभिमान हैं। प्रकृति की ओर जानेवाले, प्रकृति में आसक्त हुए हुए असुर लोग तो स्वयं अपने को ही 'ईश्वर' मानने लगते हैं ('कोन्योऽस्ति सदृशो मया') = 'मेरे जैसा दूसरा कौन है?' इन शब्दों में उनका अभिमान व्यक्त होता है। २. (सखायः) = ये मित्र होते हैं। प्रभु के चाहने वाले परस्पर मित्रता के भाव से वर्तते हैं। ३. (सोमम् सुन्वन्ति) = अपने में सोम-शक्ति का (अभिषव) = उत्पादन करते हैं। प्रभु की व्यवस्था के अनुसार आहार का अन्तिम परिणाम सोम है, इस सोम को ये अपने अन्दर ग्रहण करने का प्रयत्न करते हैं। इस सोम ने ही इनकी ज्ञानाग्नि का समिन्धन करना है और इनकी बुद्धि को सूक्ष्म करके प्रभु-दर्शन योग्य बनाना है । ४. (प्रयांसि दधति) = त्यागमय प्रयत्नों को [प्रयस् प्रयत्न, sacrifice= त्याग] ये धारण करते हैं, अर्थात् ये प्रयत्नशील तो होते ही हैं, परन्तु इनके सब प्रयत्न त्याग की भावना से ओत-प्रोत होते हैं । ५. इस प्रकार त्याग व यत्न को मिलाकर जब ये लोगों के हितसाधन में लगे होते हैं उस समय वे लोग, अपनी नासमझी के कारण इन्हें बुरा-भला कहते हैं, गालियाँ देते हैं, परन्तु ये प्रभु प्रवण लोग (जनानाम्) = उन मनुष्यों के (अभिशस्तिम्) = दुर्वचनों को ले-नहीं लेते, उन्हीं के पास रहने देते हैं। ये लोग सामान्य मनुष्यों से बहुत ऊपर उठे होते हैं, ये मनुष्य नहीं देव प्रतीत होते हैं। वेद कहता है कि (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशाली प्रभो! (त्वत् हि) = आपका ही (कश्चन) = कोई अवर्णनीय-सा (प्रकेत:) = प्रकाश (आ) = सब ओर इन व्यक्तियों में दिखता है। वस्तुतः इन लोगों का यह असामान्य मनः प्रसाद इनमें प्रभु के प्रकाश के ही कारण होता है। ये लोग सदा प्रभु के प्रिय देवों के साथ उठते-बैठते हैं, उन्हीं की ज्ञान - चर्चाओं को सुनते हैं, अतः 'देवश्रव' कहलाते हैं, उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त घृणा करते हैं, अत: 'देववात' नामवाले होते हैं। ये लोग पत्थरों का उत्तर पुष्पों से देते हैं, का प्रेम से।
Essence
भावार्थ - हम सौम्य, स्नेहवाले, सोम [शक्ति] का पान करनेवाले, सात्त्विक कर्मों का सेवन करनेवाले, सहनशील बनकर प्रभु-प्राप्ति के अभिलाषी बनें।
Subject
प्रभु-प्राप्ति का अभिलाषी