Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 17

58 Mantra
34/17
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- नोधा ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वो॑ म॒हे महि॒ नमो॑ भरध्वमाङ्गू॒ष्यꣳ शवसा॒नाय॒ साम॑।येना॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ पद॒ज्ञाऽअर्च॑न्तो॒ऽअङ्गिरसो॒ गाऽअवि॑न्दन्॥१७॥

प्र। वः॒। म॒हे। महि॑। नमः॑। भ॒र॒ध्व॒म्। आ॒ङ्गू॒ष्य᳖म्। श॒व॒सा॒नाय॑। साम॑ ॥ येन॑। नः॒। पूर्वे॑। पि॒तरः॑। प॒द॒ज्ञा इति॑ पद॒ऽज्ञाः। अर्च॑न्तः। अङ्गि॑रसः। गाः। अवि॑न्दन् ॥१७ ॥

Mantra without Swara
प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्यँ शवसानाय साम । येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञाऽअर्चन्तो अङ्गिरसो गाऽअविन्दन् ॥

प्र। वः। महे। महि। नमः। भरध्वम्। आङ्गूष्यम्। शवसानाय। साम॥ येन। नः। पूर्वे। पितरः। पदज्ञा इति पदऽज्ञाः। अर्चन्तः। अङ्गिरसः। गाः। अविन्दन्॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. नोधा ऋषि कहते हैं कि (वः) = तुम्हारी (महे) = [महसे] तेजस्विता के लिए (महि नमः) = पूज्य नमन की भावना को (प्रभरध्वम्) = अपने अन्दर खूब धारण करो । मनुष्य अतः प्रभु प्रवण बनता है तभी विषयों से बचकर शक्ति की रक्षा करता हुआ तेजस्वी बन पाता है । २. तेजस्वी बनकर (शवसानाय) = [अभिबलायमानाय] सर्वतः बलपुञ्ज की भाँति आचरण करनेवाले के लिए आवश्यक है कि वह (आङगूष्यम् साम) = ऊँचे-ऊँचे उच्चारण के योग्य उपासना मन्त्रों को अपने में धारण करे, जिससे उस शक्ति की वृद्धि के कारण उसका आचरण वासनामय न हो जाए। ३. सामान्य क्रम यह है कि [क] वासना-विजय से शक्ति प्राप्त होती है, [ख] शक्तिवृद्धि होने पर वासनाओं के बढ़ने की आशंका हो जाती है, शक्ति-प्राप्ति के लिए भी प्रभु नमन आवश्यक है और शक्तिप्राप्ति के बाद भी उस शक्ति को नाश से बचाने के लिए प्रभु नमन और अधिक आवश्यक हो जाता है। ४. 'शक्तिप्राप्ति के लिए प्रभु - नमन और शक्ति के रक्षण के लिए प्रभु नमन' यह मार्ग है (येन) = जिस मार्ग से (नः) = हमारे [क] (पूर्वे) = अपना पूरण करनेवाले, [ख] (पितर:) = रक्षण व पालन करनेवाले, [ग] (पदज्ञा:) = वेदशब्दों के रहस्य को समझनेवाले, [घ] (अर्चन्तः) = उपासक, [ङ] (अङ्गिरसः) = एक-एक अङ्ग के रस- [शक्ति] वाले लोग (गाः) = इन्द्रियों को (अविन्दन्) = प्राप्त करते थे, अर्थात् पूर्ण जितेन्द्रिय बनते थे। (गाः) = का अर्थ 'वेदवाणियों को' भी किया जा सकता है, ये लोग वेदवाणियों को पूर्णरूप से प्राप्त करनेवाले होते थे। यह एक नवीन जीवन होता है, अतः ये 'नवधा' या नोधा नामवाले हो जाते हैं।
Essence
भावार्थ- हमारे जीवन का प्रारम्भ प्रभु नमन से हो और हमारे जीवन का अन्त भी प्रभु नमन से हो।
Subject
गो-विन्द