Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 34 / Mantra 16

58 Mantra
34/16
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- नोधा ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र म॑न्महे शवसा॒नाय॑ शू॒षमा॑ङ्गू॒षं गिर्व॑णसेऽअङ्गिर॒स्वत्।सु॒वृ॒क्तिभिः॑ स्तुव॒तऽऋ॑ग्मि॒यायार्चा॑मा॒र्कं नरे॒ विश्रु॑ताय॥१६॥

प्र। म॒न्म॒हे॒। श॒व॒सा॒नाय॑। शू॒षम्। आ॒ङ्गू॒षम्। गिर्व॑णसे। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत् ॥ सु॒वृ॒क्तिभि॒रिति॑ सुवृ॒क्तिऽभिः॑ स्तु॒व॒ते। ऋ॑ग्मियाय॑। अर्चा॑म। अ॒र्कम्। नरे॑। विश्रु॑ता॒येति॒ विऽश्रु॑ताय ॥१६ ॥

Mantra without Swara
प्रम्मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषङ्गिर्वणसेऽअङ्गिरस्वत् । सुवृक्तिभि स्तुवतऽऋग्मियायार्चामार्कन्नरे विश्रुताय ॥

प्र। मन्महे। शवसानाय। शूषम्। आङ्गूषम्। गिर्वणसे। अङ्गिरस्वत्॥ सुवृक्तिभिरिति सुवृक्तिऽभिः स्तुवते। ऋग्मियाय। अर्चाम। अर्कम्। नरे। विश्रुतायेति विऽश्रुताय॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (शवसानाय) = [अभिबलायमानाय] सब ओर बल के पुञ्ज की भाँति आचरण करनेवाले के लिए (शूषम्) = शत्रुओं के शोषक बल को (प्रमन्महे) = चाहते हैं, इसके लिए वासनाओं के शोषक बल की कामना करते हैं। यदि एक बलवान् पुरुष में कामादि वासनाओं के शोषण की शक्ति न रहे तो उसका बल अत्यन्त दुरुपयुक्त होने लगता है। जितना - जितना हमारा बल बढ़े उतनी उतनी हमारी वासना- शोषणशक्ति भी प्रवृद्ध हो, जिससे हम बढ़े हुए बल के कारण कहीं अधिक वासनाओं के शिकार न हो जाएँ। २. (गिर्वणसे) = वेदवाणियों का सेवन करनेवाले के लिए (आङगुषम्) [-आघोषम् स्तोमम्] - उच्च स्वर से उच्चारण योग्य स्तुतिसमूह को उसी प्रकार [ प्रमन्महे ] = चाहते हैं (अङ्गिरस्वत्) = जैसेकि यह स्तुतिसमूह अङ्गिरा को प्राप्त हुआ । अङ्गिरा को अथर्ववेद = ब्रह्मवेद मिला. इस गिर्वण के लिए भी हम इसे चाहते हैं। वेदवाणियों का अध्ययन करनेवाला जब (ऋग्वेद) = विज्ञानवेद को पढ़ेगा तो इन अङ्गिरा के आंगूषों- ब्रह्ममन्त्रों के बिना वह विज्ञान का हिंसात्मक प्रयोग करनेवाला बन जाएगा। वैज्ञानिक उन्नति के साथ ब्रह्म के (आङ्गूष) = [ उच्च स्वर में गेय स्तोत्र] चलेंगे तो यह संकट जाता रहेगा। विज्ञान के साथ ब्रह्म-स्मरण जुड़ा तो विज्ञान निर्माण में ही नियुक्त होगा, ध्वंस में नहीं । ३. (सुवृक्तिभिः) = उत्तम वर्जनों से, अर्थात् बुराइयों को पूरी तरह त्यागने से (स्तुवते) = उस प्रभु का स्तवन करनेवाले के लिए, असत् को छोड़कर सत् को प्राप्त करनेवाले के लिए तथा (ऋग्मियाय) = ऋचाओं को प्रशस्तता से प्राप्त करनेवाले के लिए (अर्चाम्) = पूजा को (प्रमन्महे) = चाहते हैं। लोक में आदर उसी को दिया जाए जो बुराइयों को छोड़ता है तथा उत्तम विज्ञान को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति मन व मस्तिष्क दोनों की उन्नति करता है वही लोगों के आदर का पात्र बने। ४. लोग तो इसका आदर करें, परन्तु यह कहीं गर्वयुक्त न हो जाए, अतः हम इस (विश्रुताय) = दूर-दूर तक विशिष्ट प्रसिद्धि को प्राप्त (नरे) = मनुष्य के लिए (अर्कम्) = प्रभु-स्तवन को (आप्रमन्महे) = खूब ही चाहते हैं। यह 'विश्रुत नर' सदा प्रकर्षेण प्रभुस्मरण में लगा रहेगा तो यह लोगों से दिये गये अर्चन= सत्कार से अभिमान में न आएगा। व्यक्ति साधना करके प्रायेण संसार में ऊँचा उठता है, लोग उसका आदर करने लगते हैं, आदर में अतिशय वृद्धि को वह ठीक पचा नहीं पाता, अतः गर्वित हो जाता है और एक पन्थ का प्रवर्तक बन जाता है। यह स्वयं ही प्रभु के साथ पुजने लग जाता है। यह 'विश्रुत नर' सदा प्रभु स्मरण में लगा रहेगा तो अपनी तुच्छता को लोकसम्मान के भुलावे में आकर भूल न जाएगा और इस प्रकार अभिमान का शिकार भी न होगा।
Essence
भावार्थ - [क] बलवान् पुरुष वासनाओं की शोषण शक्ति से सम्पन्न हो, [ख] उच्च विज्ञान को प्राप्त करनेवाला प्रभु स्तोमों को भी प्राप्त करनेवाला बने, [ग] लोगों का आदरणीय वही हो जिसने पापों का पूर्ण वजर्न करके प्रभु के उपासक के साथ ऊँचे विज्ञान के अध्ययन को जोड़ दिया है, [घ] यह लोगों से आदर को प्राप्त 'विश्रुत' [Wellknown] नर सदा प्रभु-स्तवन में लगा रहे, जिससे अभिमान का शिकार न हो जाए। यही जीवन स्तुत्य जीवन है। इस स्तुत्य =नव [नू स्तुतौ] जीवन को धारण करनेवाला 'नवधा'=नोधा प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है। इसी का वर्णन १७वें मन्त्र में भी है।
Subject
स्तुत्य जीवन