Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 90

97 Mantra
33/90
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- त्रित ऋषिः Chhand- निचृद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
च॒न्द्रमा॑ऽअ॒प्स्वन्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि। र॒यिं पि॒शङ्गं॑ बहु॒लं पु॑रुस्पृह॒ꣳ हरि॑रेति॒ कनि॑क्रदत्॥९०॥

च॒न्द्रमाः॑। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। अ॒न्तः। आ। सु॒प॒र्णःऽइति॑ सुऽप॒र्णः। धा॒व॒ते॒। दि॒वि ॥ र॒यिम्। पि॒शङ्ग॑म्। ब॒हु॒लम्। पु॒रु॒स्पृह॒मिति॑ पु॒रु॒ऽस्पृह॑म्। हरिः॑। ए॒ति॒। कनि॑क्रदत् ॥९० ॥

Mantra without Swara
चन्द्रमाऽअप्स्वन्तरा सुपर्णा धावते दिवि । रयिम्पिशङ्गम्बहुलम्पुरुस्पृहँ हरिरेति कनिक्रदत् ॥

चन्द्रमाः। अप्स्वित्यप्ऽसु। अन्तः। आ। सुपर्णःऽइति सुऽपर्णः। धावते। दिवि॥ रयिम्। पिशङ्गम्। बहुलम्। पुरुस्पृहमिति पुरुऽस्पृहम्। हरिः। एति। कनिक्रदत्॥९०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र का कण्व 'ज्ञान, सत्य व यज्ञ' का विस्तार करके 'त्रीन् तनोती इति त्रित: ' प्रस्तुत मन्त्र का त्रित बन जाता है। इस त्रित का जीवन निम्न प्रकार का होता है। २. (चन्द्रमा) = इसका सदा आॠादमय रहनेवाला मन (अप्सु) = व्यापक कर्मों के (अन्तरा) = बीच में रहता है, अर्थात् यह अपने मन को व्यापक कर्मों में लगाये रखता है। मन को यहाँ चन्द्रमा शब्द से स्मरण किया है। मन चन्द्रमा है ही । ('चन्द्रमा मनसो जात:') = विराट् पुरुष के मन से चन्द्रमा की उत्पत्ति होती है और चन्द्रमा से पिण्ड में मन की। मन सदा आऋादमय होना चाहिए और वह सदा व्यापक कर्मों में लगा रहे। वही मन शुद्ध रहता है जो कर्मव्यापृत रहता है। ३. (सुपर्णः) = शोभन [सु] पालनादि कर्मों में लगा हुआ [पृ पालनपूरणयोः] यह 'चित्त' दिवि ज्ञान में (धावते) = [धाव्-शुद्धि] अपने को शुद्ध करता है। अपने को सदा ज्ञान में शुद्ध करते रहने से ही इसके कर्मों की पवित्रता बनी रहती है। ४. यह त्रित ज्ञान से सब मलों को दूर करके 'हरि' बना है, मलों का अपहरण करनेवाला अथवा इन्द्रियों को विषयों से प्रत्याहृत करने के कारण यह 'हरि' है। यह हरि रयिम् उस ज्ञान की सम्पत्ति को एति प्राप्त होता है जो [क] (पिशंगम्) = दीप्त है [Bright], चमकीली है, जिसमें मलों का सम्पर्क नहीं। [ख] (बहुलम्) = जो ज्ञान की सम्पत्ति [बहून् लाति] अपनी 'मैं' में बहुतों का समावेश कर लेती है, अपनी 'मैं' को व्यापक बना लेती है। ज्ञानी पुरुष सभी में प्रभु की सत्ता को देखता है, अतः सभी को अपने से अभिन्नरूप में देखता है। [ग] (पुरुस्पृहम्) = यह ज्ञान - धन पालन व पूरण करनेवाला है, अतएव स्पृहणीय है। इस ज्ञानधन को यह 'हरि' पाता है। इसको पाकर वह सदा ५. (कनिक्रदत्) = उस प्रभु के नामों का खूब उच्चारण करनेवाला बनता है। इसके जीवन में प्रभु का उपासन सतत चलता है।
Essence
भावार्थ - इस त्रित के जीवन में तीन बातें हैं- [क] यह प्रसन्नतापूर्वक कर्मों में लगा रहता है [ख] ज्ञान में अपना शोधन करता है, ज्ञान-सम्पत्ति को बढ़ाता है [ग] सदा प्रभु स्मरण करता है।
Subject
कर्म, ज्ञान, स्तुति - 'त्रित' का जीवन