Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 9

97 Mantra
33/9
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ जङ्घनद् द्रविण॒स्युर्वि॑प॒न्यया॑।समि॑द्धः शु॒क्रऽआहु॑तः॥९॥

अ॒ग्निः। वृ॒त्राणि॑। ज॒ङ्घ॒न॒त्। द्र॒वि॒ण॒स्युः। विप॒न्यया॑। समि॑द्ध॒ इति॒ सम्ऽइ॑द्धः। शु॒क्रः। आहु॑त॒ इत्याऽहु॑तः ॥९ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥

अग्निः। वृत्राणि। जङ्घनत्। द्रविणस्युः। विपन्यया। समिद्ध इति सम्ऽइद्धः। शुक्रः। आहुत इत्याऽहुतः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अग्निः) = हमारी सब उन्नतियों के साधक वे प्रभु (वृत्राणि) = ज्ञान पर पर्दा डालनेवाली कामादि वासनाओं को (जंघनत्) = नष्ट करते हैं। जीव स्वयं वासना के विजय में समर्थ नहीं। प्रभु से मिलकर ही हम काम को जीत पाते हैं। २. यह वासना-विनाशरूप कार्य प्रभु करते तभी हैं जब (द्रविणस्युः) = द्रविण के चाहनेवाले प्रभु को हम अपने द्रविण की भेंट कर दें। अथर्ववेद का मन्त्र बड़ी सुन्दरता से कहता है कि यदि मोक्ष चाहते हो तो 'मह्यं दत्त्वा ' = यह द्रविण मुझे लौटा दो। हमने धन लौटाया और वासना-वृक्ष का मूल कटा। ३. प्रभु को धन लौटाकर हम वासनाओं को जीत पाते हैं, यदि उस प्रभु का स्मरण करते रहें (विपन्यया) = विशिष्ट स्तुति के द्वारा। इसी विशिष्ट स्तुति का स्वरूप मन्त्र के उत्तरार्ध में व्यक्त किया गया है [क] (समिद्धः) = दीप्त किया गया [ख] (शुक्रः) = [शुक गतौ] जाया गया [ग] (आहुतः) = अर्पण किया गया। [क] हम उस प्रभु की भावना को अपने हृदयों में दीप्त करें, उसका चिन्तन करें। योग के शब्दों में 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' उसके नाम का जप और प्रणव के अर्थ का चिन्तन करें। [ख] इस प्रकार उस प्रभु का स्तवन करके उसकी ओर चलें, उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करें। मार्ग में आनेवाले विघ्नों को जीतकर उसकी ओर बढ़ते चलें। [ग] उसके समीप पहुँचकर उसके प्रति अपने को अर्पित कर दें। [घ] वासनाओं को नष्ट करके यह प्रभुभक्त अपने अन्दर शक्ति [वाज] का भरण [भरद्] करता है, अतः 'भरद्वाज' नामवाला हो जाता है।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करने का प्रयत्न करें, इसी उद्देश्य से धनों का यज्ञों में विनियोग करें, जिससे प्रभु हमपर आक्रमण करनेवाले वृत्रों का विनाश करें।
Subject
अग्नि का वृत्रहनन