Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 89

97 Mantra
33/89
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रैतु॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॒ प्र दे॒व्येतु सू॒नृता॑।अच्छा॑ वी॒रं नर्य्यं॑ प॒ङ्क्तिरा॑धसं दे॒वा यज्ञं॒ न॑यन्तु नः॥८९॥

प्र। ए॒तु॒। ब्रह्म॑णः। पतिः॑। प्र। दे॒वी। ए॒तु॒। सू॒नृता॑ ॥ अच्छ॑। वी॒रम्। नर्य्य॑म्। प॒ङ्क्तिरा॑धस॒मिति॑ प॒ङ्क्तिऽरा॑धसम्। दे॒वाः। य॒ज्ञम्। न॒य॒न्तु॒। नः॒ ॥८९ ॥

Mantra without Swara
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरन्नर्यम्पङ्क्तिराधसन्देवा यज्ञन्नयन्तु नः ॥

प्र। एतु। ब्रह्मणः। पतिः। प्र। देवी। एतु। सूनृता॥ अच्छ। वीरम्। नर्य्यम्। पङ्क्तिराधसमिति पङ्क्तिऽराधसम्। देवाः। यज्ञम्। नयन्तु। नः॥८९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार प्राणसाधना करनेवाला वसिष्ठ कण-कण करके उत्तमताओं का संग्रह करता है। इसी कारण 'कण्व' कहलाता है। वह कहता है- २. (ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान की अधिष्ठातृ देवता, ज्ञान का पति प्र एतु हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो। [ब्रह्म वेद] मेरा मस्तिष्क ज्ञानाग्नि से दीप्त हो। वह ब्रह्मणस्पति का अधिष्ठान बने । ३. देवी सब दिव्य गुणों की जननी (सूनृता) = [सु + ऊन + ऋत] उत्तमता से दुःखों का परिहाण करनेवाली सत्यवाणी प्र एतु हमें खूब प्राप्त हो। मेरा हृदय इस 'सूनृता देवी' का निवासस्थान बने । मैं सत्य वाणी ही बोलूँ। सत्य को भी इस उत्तमतासे बोलूँ कि वह औरों के दुःखों का परिहरण करनेवाला हो। ४. (देवाः) = सब देव, सत्य के द्वारा प्राप्त हुए-हुए सब दिव्य गुण (नः) = हमें (यज्ञम्) = यज्ञ को (अच्छ) = आभिमुख्येन (नयन्तु) = प्राप्त कराएँ, अर्थात् हमारी रुचि यज्ञों की ओर हो। हमारा मस्तिष्क ज्ञान का अधिष्ठान बने, हृदय सत्यवाणी का और इसी प्रकार हमारे हाथ यज्ञों में व्याप्त रहें जो यज्ञ (वीरम्) = [वि+ईर] हमारे से बुराइयों को कम्पित करके दूर भगा देते हैं। (नर्यम्) = जो यज्ञ नरहित को साधनेवाले हैं तथा (पंक्तिराधसम्) = पाँचों को सिद्ध करनेवाले हैं [राध सिद्ध करना] । यहाँ पाँच शब्द कर्मेन्द्रिय पञ्चक, ज्ञानेन्द्रिय पञ्चक, अन्त:करण का अवयव पञ्चक [हृदय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार] तथा प्राणपञ्चक के लिए है। यज्ञ इन सबके लिए हितकर है। यज्ञ से वृत्ति सुन्दर होती है. वृत्ति के सुन्दर हो जाने पर ये सब सुन्दर हो जाते हैं। एवं, कण्व कण-कण करके सब दिव्य गुणों का संग्रह कर लेता है।
Essence
भावार्थ - प्राणापान की साधना द्वारा वसिष्ठ बनकर हम कण-कण करके अच्छाइयों का संग्रह करनेवाले बनें। हमारा मस्तिष्क ब्रह्मणस्पति का निवास-स्थान हो, हृदय सूनृता देवी का तथा हाथ यज्ञों के आश्रय बनें।
Subject
कण्व का संग्रह-मस्तिष्क, हृदय, हाथ-ज्ञान, सत्य, यज्ञ