Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 85

97 Mantra
33/85
Devata- वायुर्देवता Rishi- जमदग्निर्ऋषिः Chhand- विराड् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ नो॑ य॒ज्ञं दि॑वि॒स्पृशं॒ वायो॑ या॒हि सु॒मन्म॑भिः।अ॒न्तः प॒वित्र॑ऽउ॒परि॑ श्रीणा॒नोऽयꣳ शु॒क्रोऽअ॑यामि ते॥८५॥

आ। नः॒। य॒ज्ञम्। दि॒वि॒स्पृश॒मिति॑ दिवि॒ऽस्पृश॑म्। वायो॒ऽइति॒ वायो॑। या॒हि। सु॒मन्म॑भि॒रिति॑ सु॒मन्म॑ऽभिः ॥ अ॒न्तरित्य॒न्तः। प॒वित्रे॑। उ॒परि॑। श्री॒णा॒नः। अ॒यम्। शु॒क्रः। अ॒या॒मि॒। ते॒ ॥८५ ॥

Mantra without Swara
आ नो यज्ञन्दिविस्पृशँवायो याहि सुमन्मभिः । अन्तः पवित्रऽउपरि श्रीणानोयँ शुक्रो अयामि ते ॥

आ। नः। यज्ञम्। दिविस्पृशमिति दिविऽस्पृशम्। वायोऽइति वायो। याहि। सुमन्मभिरिति सुमन्मऽभिः॥ अन्तरित्यन्तः। पवित्रे। उपरि। श्रीणानः। अयम्। शुक्रः। अयामि। ते॥८५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु जीव से कहते हैं- हे (वायो) = निरन्तर क्रियाशील जीव ! [वा = गति] तू (नः) = हमारे (यज्ञम्) = यजुर्वेद में प्रतिपादित इस यज्ञरूप कर्म को (आयाहि) = सर्वथा प्राप्त हो। यह यज्ञरूप कर्म (दिविस्पृशम्) = तुझे द्युलोक को स्पर्श करानेवाला है। यज्ञों से तू स्वर्ग को प्राप्त करेगा। इन यज्ञों को तूने (सुमन्मभिः) = उत्तम ज्ञानों के साथ प्राप्त होना [ मन्= अवबोध ] । ज्ञानशून्य यज्ञों में तो अपवित्रता के आने की आशंका है। वायु ऋषि को प्रभु ने यजुर्वेद का ज्ञान दिया और कहा कि इस ज्ञान के साथ चलनेवाले 'दिविस्पृश' यज्ञों को तू निरन्तर करनेवाला बनना। २. अब वायु प्रभु को उत्तर देते हुए कहते हैं कि हे पित: ! मैं [क] (अन्तः पवित्रः) = अन्दर से पवित्र बनता हुआ [ख] (उपरि श्रीणानः) = बाहरी जीवन को कुछ तपस्वी बनाता हुआ, परिपक्व करता हुआ [ग] (अयम्) = यह मैं (शुक्र) = [ शुक् गतौ ] निरन्तर क्रियाशील बनता हुआ और परिणामतः [शुच् दीप्तौ] दीप्त होता हुआ (ते आयामि:) = आपके समीप [अय गतौ, व्यत्यय से परस्मैपद] आता हूँ। प्रभु ने जीव को ज्ञानपूर्वक यज्ञों को अपनाने के लिए कहा था, जीव उसका बड़ी सुन्दरता से उत्तर देता हुआ कहता है कि मैं पवित्रता, तप, क्रियाशीलता व दीप्ति का समन्वय करता हुआ अवश्य आपके समीप प्राप्त होनेवाला बनूँगा । अन्दर की पवित्रता के लिए बाह्य तप आवश्यक है। उसके बिना जीवन विलासी बनेगा न कि पवित्र । दीप्ति के लिए क्रियाशीलता आवश्यक है। यहाँ 'शुक्र' शब्द में दोनों का भाव निहित है। इस प्रकार के जीवनवाला व्यक्ति अन्त तक 'जमदग्नि' = जीमनेवाली अग्निवाला, अर्थात् ठीक जठराग्निवाला बना रहता है। इसका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता नहीं ।
Essence
भावार्थ - जमदग्नि के जीवन में यज्ञ, ज्ञान, पवित्रता, तप, क्रियाशीलता व दीप्ति की साधना निरन्तर चलती है।
Subject
जमदग्नि