Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 83

97 Mantra
33/83
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत्सतः पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒यंꣳ स॒हस्र॒मृषि॑भिः॒ सह॑स्कृतः समु॒द्रऽइ॑व पप्रथे।स॒त्यः सोऽअ॑स्य महि॒मा गृ॑णे॒ शवो॑ य॒ज्ञेषु॑ विप्र॒राज्ये॑॥८३॥

अ॒यम्। स॒हस्र॑म्। ऋषि॑भि॒रित्यृषि॑ऽभिः। सह॑स्कृतः। सहः॑कृत॒ इति॒ सहः॑ऽकृतः। स॒मु॒द्रःऽइ॒वेति॑ समु॒द्रःऽइ॑व। प॒प्र॒थे॒ ॥ स॒त्यः। सः। अ॒स्य॒। म॒हि॒मा। गृ॒णे॒। शवः॑। य॒ज्ञेषु॑। वि॒प्र॒राज्य॒ इति॑ विप्र॒ऽराज्ये॑ ॥८३ ॥

Mantra without Swara
अयँ सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे । सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये ॥

अयम्। सहस्रम्। ऋषिभिरित्यृषिऽभिः। सहस्कृतः। सहःकृत इति सहःऽकृतः। समुद्रःऽइवेति समुद्रःऽइव। पप्रथे॥ सत्यः। सः। अस्य। महिमा। गृणे। शवः। यज्ञेषु। विप्रराज्य इति विप्रऽराज्ये॥८३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. संसार में कभी-कभी इस प्रकार के व्यक्ति भी दिख जाते हैं, जिनके लिए वेद कहता है कि ('तितिक्षन्ते अभिशस्तिं जनानाम्') = लोगों के अपशब्दों को मुस्कराते हुए सह = लेते हैं। 'ऐसा वे क्यों कर पाते हैं?' इस प्रश्न का उत्तर मन्त्र में इन शब्दों में दिया है कि (ऋषिभिः) = इन तत्त्वदर्शी लोगों ने (सहस्त्रम्) = [स+हस्] मुस्कराहट के साथ (अयम्) = यह प्रभु (सहस्कृतः) = अपना बल बनाया है। प्रभु का स्मरण करनेवाला वाग्बाणों से घायल नहीं होता। २. वे प्रभु (समुद्रः इव) = अन्तरिक्ष की भाँति (पप्रथे) = विस्तृत हैं। जहाँ आकाश, वहाँ प्रभु। वे प्रभु सर्वत्र है। सबमें विद्यमान हैं । ३. (सत्यः सः) = वे प्रभु ही सत्य हैं। प्रभु के अंतिरिक्त सभी अस्थिर हैं, एकमात्र प्रभु ही स्थिर व एकरस हैं। संसार परिवर्तनशील है, स्थल जल बनता है तो जल स्थल। जीव आज घोड़ा बना है तो कल हाथी और परसों मनुष्य । पूर्ण सत्य प्रभु ही हैं। ४. (अस्य) = इसकी (महिमा) = महिमा (गृणे) = मुझसे स्तुत होती है। मैं इस प्रभु की ही महिमा का स्तवन करता हूँ। (यज्ञेषु) = सब श्रेष्ठ कर्मों में (शवः) = वे प्रभु ही बल हैं। प्रभुकृपा से ही सब यज्ञपूर्ण होते हैं। सब यज्ञों के होता प्रभु ही हैं। (विप्रराज्ये) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवालों के जीवन की (राज्ये) = [राज्= दीप्तौ] दीप्ति में वस्तुतः उस प्रभु का ही (शवः) = बल है। जो भी व्यक्ति जितने अंश में चमकता है, यह सब चमक उस प्रभु की है। एवं, हमें अपने यज्ञों व दीप्तियों का गर्व न कर प्रभु के प्रति नतमस्तक होना है।
Essence
भावार्थ- प्रभु को हम अपनी ढाल बनाएँ। प्रभु को धारण करके यज्ञशील व दीप्तिमय बनें।
Subject
प्रभु ही सत्य