Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 82

97 Mantra
33/82
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यस्या॒यं विश्व॒ऽआर्यो॒ दासः॑ शेवधि॒पाऽअ॒रिः।ति॒रश्चि॑द॒र्य्ये रु॒शमे॒ पवी॑रवि॒ तुभ्येत्सोऽअ॑ज्यते र॒यिः॥८२॥ति॒रश्चि॑द॒र्य्ये रु॒शमे॒ पवी॑रवि॒ तुभ्येत्सोऽअ॑ज्यते र॒यिः॥८२॥

यस्यः॑ अ॒यम्। विश्वः॑। आर्य्यः॑। दासः॑। शे॒व॒धि॒पा इति॑ शेवधि॒ऽपाः। अ॒रिः ॥ ति॒रः। चि॒त्। अ॒र्य्ये। रु॒शमे॑। पवी॑रवि। तुभ्य॑। इत्। सः। अ॒ज्य॒ते॒। र॒यिः ॥८२ ॥

Mantra without Swara
यस्यायँविश्वऽआर्या दासः शेवधिपाऽअरिः । तिरश्चिदर्ये रुशमे परीरवि तुभ्येत्सोऽअज्यते रयिः ॥

यस्यः अयम्। विश्वः। आर्य्यः। दासः। शेवधिपा इति शेवधिऽपाः। अरिः॥ तिरः। चित्। अर्य्ये। रुशमे। पवीरवि। तुभ्य। इत्। सः। अज्यते। रयिः॥८२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. मेधातिथि 'विपश्चित्' बनकर अनुभव करता है कि प्रभु तो वे हैं (यस्य) = जिसका (अयम् विश्वः) = यह सारा संसार है, चाहे वे (आर्य:) = ब्राह्मण हैं [आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः] (दासः) = शूद्र हैं, (शेवधिपा) = खज़ानों के रक्षक वैश्य हैं अथवा (अरि:) [to attack] = शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले क्षत्रिय हैं। सारा समाज चार भागों में बँटा है। यह सारा समाज उस प्रभु का प्रिय है। 'ब्राह्मण' ही प्रभु के विशेष प्यारें हों ऐसी बात नहीं। वे प्रभु सर्वत्र समवस्थित हैं, सबके अन्दर उनका निवास है। मेधातिथि का दृष्टिकोण यही बनता है कि सबमें प्रभु की सत्ता को अनुभव करना ही प्रभु का सच्चा उपासक बनना है । २. 'अर्य'= पुरुष वह है जो [अर्य:- स्वामी] अपनी इन्द्रियों का अधिष्ठाता है। इन्द्रियों का दास न होने से ही अपनी शक्ति को सुरक्षित कर पाया है, वह जीर्णशक्तिवाला नहीं हो गया। 'रुशम' वह है जिसके अन्दर ज्ञान की ज्योति जगमगा रही है तथा 'पवीरवान्' वह है जो अपने शरीर को सात्त्विक अन्न व व्यायाम से वज्रतुल्य बना पाया है। इन सबके अन्दर एक ' रयि' - सम्पत्ति विद्यमान है, एक विभूति का अंश विद्यमान है। मन्त्र में कहते हैं कि ('अर्ये') = जितेन्द्रिय में रुशमे दीप्त ज्ञानवाले पुरुष में तथा पवीरवि वज्रतुल्य शरीरवाले में (तिरः चित्) = छिपी हुई (रयिः) = जो सम्पत्ति व विभूति है (सः) = वह (तुभ्य इत्) = पुरुष (अज्यते) = आपकी ही तो प्रकट हो रही है। ऐसा अनुभव करनेवाला व्यक्ति अपनी 'जितेन्द्रियता, ज्ञानदीप्ति व शारीरिक बल' का कभी गर्व नहीं करता, क्योंकि वह इस सबको प्रभु की ही महिमा के रूप में देखता है।
Essence
भावार्थ- सभी व्यक्ति प्रभु के हैं। सर्वत्र प्रभु की ज्योति ही दीप्ति का कारण बन रही है।
Subject
सबमें प्रभु की ज्योति