Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 81

97 Mantra
33/81
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒माऽउ॑ त्वा पुरूवसो॒ गिरो॑ वर्द्धन्तु॒ या मम॑।पा॒व॒कव॑र्णाः॒ शुच॑यो विप॒श्चितो॒ऽभि स्तोमै॑रनूषत॥८१॥

इ॒माः। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। त्वा॒। पु॒रू॒व॒सो॒। पु॒रु॒व॒सो॒ इति॑ पुरुऽवसो। गिरः॑। व॒र्द्ध॒न्तु॒। याः। मम॑ ॥ पा॒व॒कव॒॑र्णा॒ इति॑ पाव॒कऽव॑र्णाः। शुच॑यः। वि॒प॒श्चित॒ इति॑ विपः॒ऽचितः। अ॒भि। स्तोमैः॑। अ॒नू॒ष॒त॒ ॥८१ ॥

Mantra without Swara
इमाऽउ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम । पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोभि स्तोमैरनूषत ॥

इमाः। ऊँऽइत्यूँ। त्वा। पुरूवसो। पुरुवसो इति पुरुऽवसो। गिरः। वर्द्धन्तु। याः। मम॥ पावकवर्णा इति पावकऽवर्णाः। शुचयः। विपश्चित इति विपःऽचितः। अभि। स्तोमैः। अनूषत॥८१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'मेधातिथि' वह व्यक्ति है जो इस संसार में बुद्धिपूर्वक चलता है। समझदार व्यक्ति सर्वत्र प्रभु की शक्ति को अनुभव करता है और निम्न शब्दों में प्रभु का स्तवन करता है - हे (पुरूवसो) = पालक व पूरक निवास देनेवाले प्रभो ! (इमा या मम गिरः) = ये जो मेरी वाणियाँ हैं, वे (उ) - निश्चय से (त्वाम्) = आपका (वर्धन्तु) = वधर्न करें, अर्थात् मैं अपनी वाणी से सदा आपका स्तवन करनेवाला बनूँ। जब हम अपनी बागडोर प्रभु के हाथ में सौंपते हैं, पूर्णरूप से उसके कहने पर चलते हैं, तब हमारे शरीर स्वस्थ रहते हैं और हमारे मन में किसी प्रकार के विकार नहीं आते। २. मेधातिथि से प्रभु कहते हैं कि (स्तोमैः) = स्तुतियों से, स्तोत्रों द्वारा (अभ्यनूषत) = मेरा स्तवन वे व्यक्ति करते हैं जो [क] (पावकवर्णाः) = अग्नि के समान वर्णवाले हैं- स्वास्थ्य के कारण जिनके चेहरे पर ज्योति टपकती है, जो अग्नि के समान चमकते हैं। [ख] (शुचयः) = जिनका मन शुचि, पवित्र है। जिनके मन 'राग-द्वेष व मोह' रूप मलों से मलिन नहीं हैं। [ग] स्वस्थ्य व मानस पवित्रता से इसकी बुद्धि बड़ी उज्ज्वल व सूक्ष्म बनती है और यह सभी वस्तुओं को बड़ी बारीकी से विशेषरूप से [वि] देखता हुआ [पश्] उनका ठीक रूप में ही चिन्तन करता है [चित्] इसीलिए 'विपश्चित् ' कहलाता है। (विपश्चितः) = ये ज्ञानीलोग प्रभु के सच्चे उपासक हैं, इसीलिए हे मेधातिथे ! तू 'पावकवर्ण, शुचि व विपश्चित्' बन।
Essence
भावार्थ- हम सदा प्रभु-स्तवन करनेवाले हों। हमारी कोई भी क्रिया प्रभु को भूलकर न हो तो हम स्वस्थ बनेंगे, निर्दोष होंगे और तीव्र बुद्धि का सम्पादन कर पाएँगे।
Subject
प्रभु के सच्चे उपासक पावकवर्ण, शुचि, विपश्चित्