Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 78

97 Mantra
33/78
Devata- इन्द्रामरुतौ देवते Rishi- अगस्त्य ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब्रह्मा॑णि मे म॒तयः॒ शꣳसु॒तासः॒ शुष्म॑ऽइयर्त्ति॒ प्रभृ॑तो मे॒ऽअद्रिः॑।आ शा॑सते॒ प्रति॑ हर्य्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ऽअच्छ॑॥७८॥

ब्रह्मा॑णि। मे॒। म॒तयः॑। शम्। सु॒तासः॑। शुष्मः॑। इ॒य॒र्त्ति॒। प्रभृ॑त॒ इति॒ प्रभृ॑तः। मे॒। अद्रिः॑ ॥ आ। शा॒स॒ते॒। प्रति॑। ह॒र्य्य॒न्ति॒। उ॒क्था। इ॒मा। हरी॒ऽइति॒ हरी॑। व॒ह॒तः॒। ता। नः॒। अच्छ॑ ॥७८ ॥

Mantra without Swara
ब्रह्माणि मे मतयः शँ सुतासः शुष्मऽइयर्ति प्रभृतो मेऽअद्रिः । आ शासते प्रतिहर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नोऽअच्छ ॥

ब्रह्माणि। मे। मतयः। शम्। सुतासः। शुष्मः। इयर्त्ति। प्रभृत इति प्रभृतः। मे। अद्रिः॥ आ। शासते। प्रति। हर्य्यन्ति। उक्था। इमा। हरीऽइति हरी। वहतः। ता। नः। अच्छ॥७८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (मे) = मेरी (मतयः) = मतियाँ, इच्छाएँ, विचारपूर्वक निश्चित की गई कामनाएँ (ब्रह्माणि) = [ब्रह्म वेद:, तपः, तत्त्वम्] = वेद, तप व तत्त्व [वास्तविक सत्ता] को (आशासते) = चाहती हैं [आशास्= इच्छायाम्], अर्थात् मेरी कामना यह होती है कि [क] मैं वेदाध्ययन करूँ, [ख] मेरा जीवन तपस्वी हो, [ग] और तत्त्व तक पहुँच सकूँ, वास्तविकता [Reality] को पहचानूँ। ‘आत्मतत्त्व को छोड़कर और सब कुछ नश्वर है', इसको अनुभव करूँ। ऐसा करने पर (शुष्मः) = शत्रुओं का शोषकबल (इयर्ति) = मुझे प्राप्त होता है। मैं प्रभु के समीप पहुँचता हूँ और उस शक्ति को प्राप्त करता हूँ जो मेरे अन्तः स्थित वासनारूप शत्रुओं का शोषण कर देती है। महादेव मेरे हृदय में हैं तो कामदेव को वहाँ आने में भय लगता है। २. (सुतासः) = शरीर में रुधिरादि के क्रम से उत्पन्न सोमकण मुझे (शम्) = शान्ति की प्रति ओर (हर्यन्ति) = ले-चलते हैं, अर्थात् इन सोमकणों की रक्षा होने पर मेरे शरीर में किसी प्रकार का रोग उत्पन्न नहीं होता। इसी का परिणाम है कि (मे) = मेरा (अद्रिः) = यह अन्नमयकोश [अद्रि: कस्मात् ? अत्ति-नि० ४।४ ] = जो खाता है, (प्रभृतः) = प्रकर्षेण पोषित होता है। सोम के धारण से नीरोगता के कारण यह वज्रतुल्य बन जाता है। [अद्रिः वज्रम्] अथर्व के ('यदश्नामि बलं कुर्व इत्थं वज्रमाददे') = इस मन्त्रभाग में शरीर को 'वज्र' कहा गया है, ३. अब (इमा हरी) = ये मेरे ज्ञानेन्द्रियपञ्चक व कर्मेन्द्रियपञ्चकरूप घोड़े उक्था प्रभु के स्रोत्रों को (वहतः) = धारण करते हैं, अर्थात् मेरी इन्द्रियों से सदा प्रभु का स्तवन चलता है। इन इन्द्रियों ने अब अन्य बोझों को परे फेंककर स्तवनरूप बोझ को ही ढोया है और इस प्रकार (ता) = वे इन्द्रियरूप घोड़े (नः) = हमें (अच्छ) = अपने लक्ष्य की ओर ले चल रहे हैं। जो मनुष्य प्रभु का स्तवन करता है, वह मार्गभ्रष्ट न होने से लक्ष्य पर पहुँचता है। मार्गभ्रष्ट न होने से ही यह 'अगस्त्य' बना रहता है, पाप पर्वत [ अग] का संहार करनेवाला [ स्त्यै संघाते ] । इस अगस्त्य की कामना यह होती है- [क] उसकी बुद्धि ब्रह्म की ओर हो, [ख] उसका शरीर सोम से नीरोग व शान्तिवाला हो [ग] उसकी इन्द्रियाँ प्रभु-स्तवन करती हुई लक्ष्य की ओर बढ़ती चलें।
Essence
भावार्थ-अगस्त्य-पाप-समूह का संहार करनेवाला बनने का उपाय यह है कि हम बुद्धि को ज्ञानोपार्जन में लगाएँ, शरीर को सोमरक्षा से नीरोग बनाएँ और इन्द्रियों को प्रभु-स्तवन में प्रेरित करें।
Subject
अगस्त्य की कामना