Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 72

97 Mantra
33/72
Devata- विद्वान् देवता Rishi- दक्ष ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
काव्य॑योरा॒जाने॑षु॒ क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य दुरो॒णे।रि॒शाद॑सा स॒धस्थ॒ऽआ॥७२॥

काव्य॑योः। आ॒जाने॒ष्वित्या॒ऽजाने॑षु। क्रत्वा॑। दक्ष॑स्य। दु॒रो॒णे। रि॒शाद॑सा। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। आ ॥७२ ॥

Mantra without Swara
काव्ययोराजानेषु क्रत्वा दक्षस्य दुरोणे । रिशादसा सधस्थऽआ ॥

काव्ययोः। आजानेष्वित्याऽजानेषु। क्रत्वा। दक्षस्य। दुरोणे। रिशादसा। सधस्थ इति सधऽस्थे। आ॥७२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र में घर के लिए 'दुरोण' शब्द आया है, जिसकी भावना है 'जिसमें से ('दुर्') = बुराई को [ओण अपनयने] दूर किया गया है। वस्तुत: पति-पत्नी ने बुराइयों को दूर करके घर को अच्छाइयों से युक्त करना है । (सधस्थे) = सहस्थे यह मिलकर रहने की जगह है। परस्पर वैर-विरोध होने पर तो घर की इतिश्री हो जाती है। यह घर (दक्षस्य) = चतुर पुरुष का है। 'योगः कर्मसु कौशलम्' कर्मों में कुशलता का नाम योग है, अतः यह गृहपति योगी है। यह अपने घर को अधिक-से-अधिक सुन्दर बनाने का ध्यान करता है। इस घर की अच्छाइयाँ ये हैं- [क] यह घर बुराइयों से दूर है, [ख] इसमें सब मिलकर प्रेम-से रहते हैं, [ग] इसमें सब कार्य दक्षता से किये जाते हैं। किसी कार्य में भद्दापन नहीं होता। २. [क] 'वेद' प्रभु का काव्य है- ('पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति') = प्रभु के इस काव्य को देखो, जो कभी न नष्ट होता है, न जीर्ण होता है। [ख] सृष्टि भी प्रभु का काव्य ही है। इसकी रचना अत्यन्त कलापूर्ण है। (काव्ययोः) = इन दोनों काव्यों में वेदरूप काव्य के आजानेषु समन्तात् ज्ञान प्राप्त करने व सृष्टिरूप काव्य में (आजानेषु) = लोकहित के कार्यों के करने में (क्रत्वा) = क्रिया-संकल्प व प्रज्ञान से (रिशादसा) = [रिश+अदस् ] = सब हिंसाओं को खा जानेवाले, अर्थात् समाप्त कर देनेवाले पति - पत्नी उल्लिखित घर में (आ) [ आगतम्] = आएँ ३. [क] पति-पत्नी प्रभु के वेदरूप काव्य को [आजान] अच्छी प्रकार समझने का प्रयत्न करें। इसके लिए उनमें पुरुषार्थ हो, उनके हृदयों में वेदाध्ययन का संकल्प हो और इसप्रकार वे वेद का ज्ञान प्राप्त करें। [ख] ये पति-पत्नी इस सृष्टि को भी प्रभुकाव्य की कलामयी कृति के रूप में देखें। वे इसमें सब लोगों के हित के लिए [ आ-जान =जनहित] कर्म करने के संकल्पवाले हों, [ग] ये पति-पत्नी सब प्रकार की हिंसा से ऊपर उठें।
Essence
भावार्थ- हम अपने सधस्थ = घर को 'दक्ष का दुरोण' बनाने का प्रयत्न करें।
Subject
उत्तम घर-दक्ष का दुरोण