Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 63

97 Mantra
33/63
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये त्वा॑हि॒हत्ये॑ मघव॒न्नव॑र्द्ध॒न्ये शा॑म्ब॒रे ह॑रिवो॒ ये गवि॑ष्टौ।ये त्वा॑ नू॒नम॑नु॒मद॑न्ति॒ विप्राः॒ पिबे॑न्द्र॒ सोम॒ꣳ सग॑णो म॒रुद्भिः॑॥६३॥

ये। त्वा। अ॒हि॒हत्य॒ इत्य॑हि॒ऽहत्ये॑। म॒घ॒वन्निति॑ मघऽवन्। अव॑र्द्धन्। ये। शा॒म्ब॒रे। ह॒रि॒व इति॑ हरिऽवः। ये। गवि॑ष्ठा॒विति॒ गोऽइ॑ष्ठौ ॥ ये। त्वा। नू॒नम्। अ॒नुमद॒न्तीत्य॑नु॒मद॑न्ति। विप्राः॑। पिब॑। इ॒न्द्र॒। सोम॑म्। सग॑ण॒ इति॒ सऽग॑णः। म॒रुद्भि॒रिति॑ म॒रुत्ऽभिः॑ ॥६३ ॥

Mantra without Swara
ये त्वाहिहत्ये मघवन्नवर्धन्ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ । ये त्वा नूनमनुमदन्ति विप्राः पिबेन्द्र सोमँ सगणो मरुद्भिः ॥

ये। त्वा। अहिहत्य इत्यहिऽहत्ये। मघवन्निति मघऽवन्। अवर्द्धन्। ये। शाम्बरे। हरिव इति हरिऽवः। ये। गविष्ठाविति गोऽइष्ठौ॥ ये। त्वा। नूनम्। अनुमदन्तीत्यनुमदन्ति। विप्राः। पिब। इन्द्र। सोमम्। सगण इति सऽगणः। मरुद्भिरिति मरुत्ऽभिः॥६३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि विश्वामित्र है। यह सभी से प्रेम करता है। यह विश्वामित्र पहला काम ‘अहि-हत्या' के रूप में करता है। 'अहि' वृत्र है। ये दोनों शब्द समानार्थक हैं। वृत्र कामवासना का नाम है, क्योंकि यह हमारे ज्ञान पर पर्दा डाल देती है। इसे 'अहि' नाम इसलिए दिया कि यह 'आहन्ति' = मनुष्य का विनाश करती है। इस अहि-हत्या के लिए विप्र प्रभु का वर्धन करते हैं। (ये) = जो (त्वा) = तुझे (अहि हत्ये) = इस वृत्र व कामवासनाओं के नाश के निमित्त (अवर्धन्) = बढ़ाते हैं। हे प्रभो! आप (मघवन्) = निष्पाप ऐश्वर्यवाले हैं [मा+अघ] अथवा यज्ञमय [मघमख] हैं। यह विप्र भी आपकी यज्ञमयता का स्तवन करता है और यज्ञमय बनता हुआ वासना को विनष्ट करता है। २. 'शंबर' ईर्ष्या का नाम है, यह मनुष्य की मानस शान्ति को समाप्त कर देती है। इस शंबर के साथ युद्ध को यहाँ 'शांबर' कहा गया है। विप्र लोग वे हैं (ये) = जो (शाम्बरे) = ईर्ष्या के साथ युद्ध में आपका स्मरण करते हैं और ईर्ष्या से ऊपर उठ जाते हैं । ३. हे प्रभो! आप 'हरिवान्' हैं, दुःखनाशक [ह हरणे] ज्ञान की किरणोंवाले [हरयः रश्मयः] हैं। विप्र वे हैं ये जो हे हरिवः ज्ञान रश्मियोंवाले प्रभो! आपको गविष्टौ [गो+इष्ट] ज्ञानयज्ञों में बढ़ाते हैं, अर्थात् स्तुत करते हैं। प्रभु मूल आचार्य हैं, गुरुओं के भी गुरु हैं । ५. फिर (विप्राः) = विप्र वे हैं (ये) = जो (नूनम्) = निश्चय से (त्वा) = आपको अनुमदन्ति प्राप्त करने के बाद प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। आपकी प्राप्ति में ही जिन्हें आनन्द होता है, जो सभी प्राकृतिक भोगों के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं रखते। ६. एवं विप्र वह है जो [क] काम और ईर्ष्या पर विजय पाता है, [ख] ज्ञानयज्ञ का विस्तार करता है और [ग] प्रभु-प्राप्ति में आनन्द का अनुभव करता है। ऐसा विप्र बनने के लिए मन्त्र की समाप्ति पर प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! तू (सगणः) = ज्ञानेन्द्रिय पंचक, कार्मेन्द्रिय पंचक व पाँच प्राणों के गण से युक्त हुआ हुआ (मरुद्भिः) = [मरुतः प्राण] प्राणों के द्वारा (सोमं पिब) = सोम का पान कर। जब जीव प्राणसाधना करता है तब उसके वीर्य की ऊर्ध्वगति उसे श्रीसम्पन्न बनाती है। उसी समय काम व ईर्ष्या का नाश होता है, ज्ञानयज्ञ चलता है और अन्ततः प्रभु-दर्शन होता है।
Essence
भावार्थ - विप्र वह है जो काम पर विजय पाता है, ईर्ष्या को नष्ट करता है, ज्ञानयज्ञ का विस्तार करता है, प्रभु-प्राप्ति में आनन्दानुभव करता है। विप्र बनने के लिए वह जितेन्द्रिय बनकर प्राणसाधना के द्वारा वीर्य की ऊर्ध्वगति के लिए प्रयत्नशील होता है।
Subject
विप्र का लक्षण - विप्र बनने का उपाय