Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 61

97 Mantra
33/61
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒ग्रा वि॑घ॒निना॒ मृध॑ऽइन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। ता नो॑ मृडातऽई॒दृशे॑॥६१॥

उ॒ग्रा। विघ॒निनेति॑ विऽघ॒निना॑। मृधः॑। इ॒न्द्रा॒ग्नीऽइती॑न्द्रा॒ग्नी। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ ता। नः॒। मृ॒डा॒तः॒। ई॒दृशे॑ ॥६१ ॥

Mantra without Swara
उग्रा विघनिना मृधऽइन्द्राग्नी हवामहे । ता नो मृडात ईदृशे ॥

उग्रा। विघनिनेति विऽघनिना। मृधः। इन्द्राग्नीऽइतीन्द्राग्नी। हवामहे॥ ता। नः। मृडातः। ईदृशे॥६१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रस्तुत मन्त्र का देवता 'इन्द्राग्नी' हैं। 'इन्द्र' पति है उसने शक्तिशाली होना है और धन कमाना है। इन्द्र असुरों का संहार करता है, पति ने भी आसुरवृत्ति का संहार करते हुए चलना है। पत्नी ने 'अग्नि' बनना है। मन्त्र संख्या ५९ में इसके लिए 'अग्रं नयत्' तो कहा ही गया है । गृहिणी वही जो घर को आगे ले चलती है-अग्नि है । २. ये दोनों (उग्रा) = उदात्त स्वभाव के हैं। इनके शील में कहीं भी कमीनापन नहीं होता। ये उदार होते हैं । ५९ में पत्नी को 'प्रथमा' = विशाल हृदयवाली कहा ही गया है। इनकी उदात्तता पर घर की उदात्तता निर्भर करती है। इनके दिल छोटे होते हैं तो घर भी छोटा बन जाता है। ३. ये (इन्द्राग्नी) = पति-पत्नी (मृधः) = हमारा वध करनेवाले जो काम-क्रोधादि शत्रु हैं, उनका विघनिना - विशेषरूप से हनन करनेवाले होते हैं। काम-क्रोध पर विजय ही संसार-संग्राम में सच्चा विजय है। इसी में गृहस्थ की सफलता है। ४. ऐसे इन्द्राग्नी को ही (हवामहे) - हम पुकारते हैं, अर्थात् प्रभु से यही आराधना करते हैं कि हमारे राष्ट्र में प्रत्येक घर में ऐसे पति-पत्नी हों तभी राष्ट्र का एक-एक घर उत्तम बनकर राष्ट्र का उत्थान होगा। इन्द्राग्नी का अर्थ राजा-रानी लें तो अर्थ होगा हमारे राष्ट्र के प्रमुख पुरुष शासक व शासिकाएँ उदात्त व शत्रुनाशक हों। वे काम-क्रोध के वशीभूत न हों। इन्हीं का अनुकरण शेष प्रजा ने करना है। इन्द्राग्नी का अर्थ राजा व सेनापति लें तो बाह्य शत्रुओं से राष्ट्र की रक्षा करने की भावना भी 'मृधः विघनिना' शब्दों से सूचित होती है। ये राष्ट्र-शत्रुओं को कुचल डालनेवाले हों । ५. (ता) = ऐसे पति-पत्नी ही (नः) = हम सबको (ईदृशे) = इस प्रलोभनमय संसार में (मृडातः) = सुखी करनेवाले होते हैं। जिस राष्ट्र में पति-पत्नी 'इन्द्राग्नी' होंगे उस राष्ट्र में न कोई भूखा मरेगा [इन्द्र = ऐश्वर्य], न ही कोई मूर्ख होगा [अग्नि- प्रकाश]। कितना सुखमय व सुन्दर होगा वह राष्ट्र ! यह राष्ट्र 'भरद्वाजों' का होगा। उन लोगों का जिन्होंने काम-क्रोध को जीतकर अपने में शक्ति का भरण किया है [ भरद्+वाज = भरद्= भरता है, वाज-शक्ति को ] ।
Essence
भावार्थ- पति-पत्नी उदात्त स्वभाव के व काम-क्रोध को जीतनेवाले हों।
Subject
पति-पत्नी, राजा-रानी अथवा राजा व सेनापति